मशीन बनती जिंदगी: क्या हम भावनाओं को पीछे छोड़ रहे हैं?
आज के दौर में भागदौड़ भरी जिंदगी ने हमें एक ऐसी दौड़ में शामिल कर दिया है जहाँ रुकने का नाम नहीं है। सुबह अलार्म की गूंज से शुरू होने वाला दिन देर रात थकावट के साथ खत्म होता है। इस बीच, हम शायद यह भूल गए हैं कि हम इंसान हैं, मशीन नहीं। ‘अमर उजाला’ की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि हमारी जीवनशैली तेजी से यांत्रिक (mechanical) होती जा रही है, जिसका सीधा असर हमारे रिश्तों और विशेषकर बच्चों पर पड़ रहा है।
परिवारों में क्यों कम हो रही है बच्चों के प्रति संजीदगी?
एक समय था जब परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों के साथ समय बिताते थे, उन्हें कहानियां सुनाते थे और उनके व्यवहार पर पैनी नजर रखते थे। लेकिन आज का परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। परिवारों में बच्चों के प्रति संजीदगी कम होने के कई प्रमुख कारण सामने आए हैं:
- डिजिटल गैजेट्स का बढ़ता दखल: आज माता-पिता और बच्चे, दोनों ही अपने स्मार्टफोन्स में कैद हैं। घर में एक साथ शारीरिक रूप से उपस्थित होकर भी लोग मानसिक रूप से एक-दूसरे से मीलों दूर हैं। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने वास्तविक संवाद को खत्म कर दिया है।
- अंधी प्रतिस्पर्धा की दौड़: आधुनिक माता-पिता बच्चों के भावनात्मक विकास से ज्यादा उनके ग्रेड्स, कोचिंग और करियर को लेकर चिंतित रहते हैं। बच्चों को एक ‘प्रोजेक्ट’ की तरह देखा जा रहा है, न कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में।
- वर्किंग पेरेंट्स और समय का अभाव: करियर की ऊंचाइयों को छूने की चाह में माता-पिता अक्सर इतने थक जाते हैं कि वे बच्चों को वह ‘क्वालिटी टाइम’ नहीं दे पाते, जिसकी उन्हें भावनात्मक सुरक्षा के लिए जरूरत होती है।
यांत्रिक जीवनशैली का बच्चों पर पड़ता गहरा असर
जब घर का माहौल मशीन जैसा हो जाता है और भावनाओं की जगह केवल निर्देशों (instructions) का आदान-प्रदान होता है, तो इसका सबसे गहरा असर बच्चों के कोमल मन पर पड़ता है। वे अनकहे अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। संवाद की कमी के कारण बच्चे अपनी बातें साझा नहीं कर पाते, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन, तनाव और यहाँ तक कि अवसाद जैसी समस्याएं पनप रही हैं।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जो बच्चे भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस करते हैं, वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए गलत रास्तों, जैसे कि अत्यधिक गेमिंग या इंटरनेट की लत का सहारा लेने लगते हैं। यह उन्हें वास्तविक मानवीय संवेदनाओं से और अधिक दूर ले जाता है।
क्या है इसका समाधान?
हमें यह गहराई से समझना होगा कि बच्चे कोई कंप्यूटर प्रोग्राम नहीं हैं जिन्हें केवल डेटा और इनपुट की आवश्यकता हो। उन्हें प्यार, शारीरिक स्पर्श और सुनने वाले कानों की जरूरत है। परिवारों को फिर से अपनी प्राथमिकताओं को तय करना होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, निम्नलिखित कदम मददगार साबित हो सकते हैं:
- गैजेट-फ्री समय: दिन में कम से कम एक घंटा ऐसा तय करें जिसमें कोई भी सदस्य फोन या लैपटॉप का इस्तेमाल न करे और सब मिलकर बातें करें।
- सक्रिय श्रवण (Active Listening): बच्चों की छोटी-छोटी बातों को गंभीरता से सुनें और उन्हें यह महसूस कराएं कि उनकी राय मायने रखती है।
- मूल्यों पर जोर: सफलता के साथ-साथ बच्चों को मानवीय मूल्यों, सहानुभूति और दयालुता के बारे में भी सिखाएं।
निष्कर्षतः, यदि हम अपनी जीवनशैली में बदलाव नहीं लाते और बच्चों के प्रति अपनी संजीदगी को पुनः जीवित नहीं करते, तो भविष्य की पीढ़ी भावनात्मक रूप से रिक्त हो सकती है। यह समय अपनी ‘मशीनी’ दिनचर्या को तोड़कर फिर से ‘इंसान’ बनने और अपने बच्चों को एक सुरक्षित भावनात्मक भविष्य देने का है।