शिक्षा सेवक और उनकी बढ़ती भूमिका
शिक्षा सेवक बिहार और अन्य राज्यों की शिक्षा व्यवस्था के वे आधार स्तंभ हैं, जो जमीनी स्तर पर शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते हैं। हाल ही में दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने इन शिक्षा सेवकों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिए मोबाइल की राशि का वितरण शुरू कर दिया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता लाना और डेटा संग्रह की प्रक्रिया को तेज करना है। शिक्षा सेवक, जिन्हें कई स्थानों पर टोला सेवक भी कहा जाता है, मुख्य रूप से महादलित, दलित और अल्पसंख्यक पिछड़ा वर्ग के बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने का कार्य करते हैं।
सरकार द्वारा प्रदान की गई इस सहायता राशि से अब ये कर्मी अपने कार्यों को अधिक कुशलता से कर सकेंगे। पहले, कागजी कार्रवाई के कारण सूचनाओं को मुख्यालय तक पहुँचाने में काफी समय लगता था, लेकिन अब स्मार्टफोन के माध्यम से वे रियल-टाइम डेटा अपडेट कर पाएंगे।
मोबाइल राशि वितरण का मुख्य उद्देश्य
शिक्षा विभाग ने यह महसूस किया कि वर्तमान समय में तकनीक के बिना शिक्षा व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण संभव नहीं है। शिक्षा सेवकों को मोबाइल की राशि देने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं:
- ई-शिक्षाकोष पोर्टल पर हाजिरी: अब शिक्षा सेवकों और छात्रों की उपस्थिति मैन्युअल रजिस्टर के बजाय ऑनलाइन दर्ज की जाएगी।
- डाटा एंट्री में तेजी: स्कूल से बाहर रहे बच्चों (Out of School Children) का डेटा अब तुरंत पोर्टल पर अपलोड किया जा सकेगा।
- योजनाओं की मॉनिटरिंग: मध्याह्न भोजन और अन्य सरकारी योजनाओं की रिपोर्टिंग अब सीधे ऐप के माध्यम से होगी।
- डिजिटल साक्षरता: शिक्षा सेवकों को स्वयं भी तकनीक से रूबरू होने का अवसर मिलेगा, जिससे वे समाज के अन्य वर्गों को भी जागरूक कर सकेंगे।
शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की नई लहर
शिक्षा सेवक अब केवल बच्चों को स्कूल लाने तक सीमित नहीं रहेंगे। उन्हें विभाग द्वारा दिए गए विशेष निर्देशों के अनुसार विभिन्न ऐप का संचालन करना होगा। सरकार ने इसके लिए प्रत्येक शिक्षा सेवक के बैंक खाते में मोबाइल खरीदने हेतु निर्धारित राशि हस्तांतरित कर दी है। यह राशि सीधे डीबीटी (Direct Benefit Transfer) के माध्यम से भेजी गई है ताकि बीच में किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, कई जिलों में इस राशि का वितरण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है और शिक्षा सेवकों ने स्मार्टफोन खरीदना भी शुरू कर दिया है। यह पहल बिहार के ‘सात निश्चय’ कार्यक्रमों और शिक्षा में सुधार के संकल्प को दर्शाती है। शिक्षा सेवकों का कार्यभार भी अब पहले की तुलना में अधिक संगठित होने की उम्मीद है।
शिक्षा सेवकों की जिम्मेदारियां और चुनौतियां
एक शिक्षा सेवक के कंधों पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होती हैं। वे न केवल बच्चों को स्कूल लाते हैं, बल्कि अभिभावकों को भी शिक्षा के प्रति जागरूक करते हैं। मोबाइल मिल जाने से उनकी कुछ चुनौतियां कम जरूर होंगी, लेकिन डिजिटल साक्षरता का अभाव अभी भी एक बड़ा मुद्दा है।
- फील्ड वर्क: उन्हें प्रतिदिन बस्तियों का दौरा करना होता है और बच्चों की सूची तैयार करनी होती है।
- समन्वय: स्कूल के प्रधानाध्यापक और स्थानीय समुदाय के बीच एक सेतु का कार्य करना।
- रिपोर्टिंग: ब्लॉक स्तर पर शिक्षा अधिकारियों को साप्ताहिक और मासिक रिपोर्ट देना।
तकनीकी प्रशिक्षण के माध्यम से इन चुनौतियों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार जल्द ही इन कर्मियों के लिए कार्यशालाएं आयोजित करने की योजना बना रही है, जहाँ उन्हें स्मार्टफोन चलाने और सरकारी ऐप का उपयोग करने की ट्रेनिंग दी जाएगी।
भविष्य की राह और निष्कर्ष
शिक्षा सेवक यदि तकनीक से लैस होते हैं, तो इसका सीधा लाभ राज्य के साक्षरता दर पर पड़ेगा। मोबाइल की राशि मिलने के बाद अब उम्मीद की जा रही है कि डेटा में होने वाली हेराफेरी रुकेगी और वास्तविक लाभान्वित बच्चों तक सरकारी सुविधाएं पहुँच सकेंगी। यह न केवल एक वित्तीय सहायता है, बल्कि यह शिक्षा सेवकों के प्रति सरकार के भरोसे का प्रतीक भी है।
आने वाले समय में, यह डिजिटल क्रांति ग्रामीण शिक्षा के परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकती है। शिक्षा सेवकों को दी गई यह छोटी सी राशि एक बड़े बदलाव की नींव साबित हो सकती है। सरकार के इस कदम की सराहना विभिन्न शिक्षक संघों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी की है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि शिक्षा सेवक इस तकनीक का उपयोग कितनी सक्रियता के साथ करते हैं।
निष्कर्ष
अंततः, शिक्षा सेवकों को मोबाइल राशि प्रदान करना बिहार शिक्षा विभाग का एक सराहनीय कदम है। इससे न केवल सरकारी कामकाज में पारदर्शिता आएगी, बल्कि शिक्षा के अधिकार को अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचाने में भी मदद मिलेगी। दैनिक भास्कर की यह खबर राज्य भर के हजारों शिक्षा सेवकों के लिए खुशी की लहर लेकर आई है, जो लंबे समय से इस तरह की सुविधाओं की मांग कर रहे थे। अब डिजिटल इंडिया की गूंज बिहार के दूरदराज के टोलों और गांवों में भी सुनाई देगी।