हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधार और संसाधनों के सही उपयोग की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए हिमाचल स्कूल मर्जर की प्रक्रिया को मंजूरी दे दी है। सरकार के ताजा आदेश के अनुसार, राज्य के कुल 62 प्राइमरी और मिडल स्कूलों को अब नजदीकी बड़े स्कूलों में मर्ज (विलय) किया जाएगा। यह फैसला उन संस्थानों पर लागू किया गया है जहां छात्रों की संख्या निर्धारित मानकों से काफी कम थी। विशेष बात यह है कि इस सूची में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर के निर्वाचन क्षेत्रों के स्कूल भी शामिल हैं, जो यह दर्शाता है कि सरकार शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए कड़े फैसले लेने से पीछे नहीं हट रही है।
कम नामांकन वाले स्कूलों पर कार्रवाई
हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग द्वारा जारी की गई अधिसूचना के मुताबिक, जिन प्राइमरी स्कूलों में छात्रों की संख्या 5 से कम और मिडल स्कूलों में 10 से कम थी, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर बंद या मर्ज किया जा रहा है। काफी समय से विभाग इन स्कूलों की स्थिति का आकलन कर रहा था। हिमाचल स्कूल मर्जर के इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य उन स्कूलों को व्यवस्थित करना है जो केवल नाममात्र के छात्रों के साथ चल रहे थे। इससे न केवल सरकारी धन की बचत होगी, बल्कि शिक्षकों का बेहतर प्रबंधन भी संभव हो सकेगा।
मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के क्षेत्र भी प्रभावित
इस फैसले की सबसे अधिक चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि इसमें किसी भी तरह का राजनीतिक भेदभाव नहीं देखा गया है। मुख्यमंत्री के गृह जिले हमीरपुर और उनके निर्वाचन क्षेत्र नादौन के साथ-साथ शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र जुब्बल-कोटखाई के कुछ स्कूलों को भी इस सूची में शामिल किया गया है। इसके अलावा शिमला, मंडी, कांगड़ा और सोलन जैसे बड़े जिलों में भी कई स्कूलों पर ताला लटका है। सरकार का तर्क है कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए स्कूलों का सुदृढ़ीकरण आवश्यक है।
शिक्षकों और छात्रों का क्या होगा?
अभिभावकों और छात्रों के मन में यह सवाल है कि इस मर्जर के बाद उनकी पढ़ाई पर क्या असर पड़ेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जिन स्कूलों को मर्ज किया गया है, उनके छात्रों को नजदीकी स्कूल में स्थानांतरित किया जाएगा। छात्रों को स्कूल आने-जाने में कोई समस्या न हो, इसके लिए परिवहन संबंधी पहलुओं पर भी विचार किया जा रहा है। वहीं, इन स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को उन स्कूलों में नियुक्त किया जाएगा जहां लंबे समय से शिक्षकों के पद रिक्त चल रहे थे। इससे प्रदेश के दूरदराज के क्षेत्रों में ‘टीचर-स्टूडेंट रेश्यो’ को संतुलित करने में मदद मिलेगी।
विपक्ष और स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
हिमाचल प्रदेश में स्कूलों को मर्ज करने के फैसले पर राजनीति भी गरमाने लगी है। विपक्ष का कहना है कि स्कूलों को बंद करने के बजाय सरकार को वहां छात्रों की संख्या बढ़ाने के उपाय करने चाहिए थे। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का मानना है कि स्कूल बंद होने से बच्चों को अब पैदल लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है, जिससे विशेषकर लड़कियों की शिक्षा पर प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, सरकार का कहना है कि हिमाचल स्कूल मर्जर का यह कदम लंबी अवधि में शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाएगा और सरकारी स्कूलों के प्रति लोगों का विश्वास फिर से जगाएगा।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश सरकार का यह निर्णय राज्य की गिरती शैक्षणिक गुणवत्ता को सुधारने की एक कोशिश है। यदि यह मर्जर सही ढंग से लागू होता है और शिक्षकों का सही उपयोग किया जाता है, तो निश्चित रूप से सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहतर होगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की चुनौतियों से कैसे निपटती है और क्या यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बनेगा।