इज ऑफ डूइंग बिजनेस: केंद्र की टास्क-फोर्स अध्यक्ष ने की चर्चा, उद्योगों की मांग – MSME की जमीन में 40% व्यवस्था | दैनिक भास्कर

**व्यवसाय सुगमता: केंद्र की पहल और MSME की नई मांग**

**व्यवसाय सुगमता** को लेकर केंद्र सरकार लगातार प्रयासरत है, और इसी दिशा में हाल ही में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक की अध्यक्षता केंद्र की टास्क-फोर्स के अध्यक्ष ने की, जिसमें विभिन्न उद्योगों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस चर्चा का मुख्य बिंदु ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को और अधिक प्रभावी बनाना था, लेकिन इस बार उद्योगों, विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) ने अपनी कुछ नई और महत्वपूर्ण माँगें रखीं। इनमें सबसे प्रमुख मांग MSME की अधिग्रहित जमीन के उपयोग में 40% हिस्सेदारी को लेकर थी, जो भविष्य में इस क्षेत्र के विकास को नई दिशा दे सकती है।

**’इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ का महत्व और वर्तमान स्थिति**

‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) की रैंकिंग में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय सुधार किया है। इसका सीधा संबंध देश में निवेश को आकर्षित करने, नई कंपनियों की स्थापना को बढ़ावा देने और मौजूदा व्यवसायों के विस्तार के लिए अनुकूल माहौल बनाने से है। सरकार ने कई नियामक सुधार किए हैं, लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को सरल बनाया है, और ऑनलाइन पोर्टल्स के माध्यम से सरकारी सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाई है। इन प्रयासों का उद्देश्य नौकरशाही की बाधाओं को कम करना और उद्यमियों को अपना व्यवसाय निर्बाध रूप से चलाने में मदद करना है।

**टास्क-फोर्स की बैठक: किन मुद्दों पर हुई चर्चा?**

हालिया बैठक में, टास्क-फोर्स अध्यक्ष ने ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की वर्तमान स्थिति की समीक्षा की और भविष्य की योजनाओं पर विचार-विमर्श किया। उन्होंने सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में आ रही चुनौतियों और सुधार के क्षेत्रों पर जोर दिया। बैठक में शामिल उद्योग प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए और उन बाधाओं को उजागर किया जो अभी भी उनके व्यवसाय संचालन को प्रभावित कर रही हैं।

**MSME की प्रमुख मांग: जमीन में 40% हिस्सेदारी**

बैठक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा MSME क्षेत्र से जुड़ी मांगों पर केंद्रित था। MSME, भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं, जो रोजगार सृजन और निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। हालांकि, उन्हें अक्सर भूमि अधिग्रहण और उसके उपयोग में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस बार, MSME प्रतिनिधियों ने एक अभिनव प्रस्ताव रखा: यह मांग की गई कि MSME को आवंटित या अधिग्रहित की गई जमीन के कम से कम 40% हिस्से का उपयोग इन उद्यमों द्वारा ही किया जाना चाहिए।

इस मांग के पीछे कई कारण हैं:

  • **MSME का प्रत्यक्ष लाभ:** वर्तमान में, औद्योगिक भूखंडों का आवंटन अक्सर बड़े निगमों या बाहरी डेवलपर्स द्वारा किया जाता है, जिससे MSME को सीधे लाभ नहीं मिल पाता। 40% हिस्सेदारी की मांग यह सुनिश्चित करेगी कि MSME को भी इन भूखंडों पर अपना संयंत्र या इकाई स्थापित करने का अवसर मिले।
  • **रोजगार सृजन में वृद्धि:** MSME, बड़े उद्योगों की तुलना में प्रति इकाई अधिक रोजगार पैदा करते हैं। जमीन के बेहतर आवंटन से MSME का विस्तार होगा, जिससे अधिक रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
  • **क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा:** MSME अक्सर स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े होते हैं। उन्हें जमीन मिलने से उस क्षेत्र में औद्योगिक विकास को गति मिलेगी और स्थानीय समुदायों को फायदा होगा।
  • **मूल्य श्रृंखला का एकीकरण:** यदि MSME को भी जमीन मिलती है, तो वे बड़े उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण घटक या सेवा प्रदाता के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत कर सकते हैं, जिससे समग्र मूल्य श्रृंखला मजबूत होगी।
  • **निवेश का बेहतर उपयोग:** सरकार द्वारा औद्योगिक विकास के लिए जमीन अधिग्रहण और विकास पर किए गए निवेश का बेहतर और अधिक समावेशी उपयोग सुनिश्चित होगा।

**आगे की राह: सरकारी प्रतिक्रिया और भविष्य की संभावनाएं**

टास्क-फोर्स अध्यक्ष और अन्य सरकारी अधिकारियों ने MSME की इस मांग को ध्यान से सुना। यह स्पष्ट है कि सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सिद्धांत पर काम कर रही है, और MSME की चिंताओं को दूर करना उसकी प्राथमिकता है। इस मांग पर विचार-विमर्श के लिए एक समिति गठित की जा सकती है, जो इसकी व्यवहार्यता, कार्यान्वयन के तरीकों और संभावित प्रभावों का अध्ययन करेगी।

यदि यह मांग स्वीकार की जाती है, तो यह ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के एजेंडे में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है। यह न केवल MSME के लिए एक बड़ा बढ़ावा होगा, बल्कि देश के समग्र औद्योगिक परिदृश्य को भी अधिक समावेशी और टिकाऊ बनाएगा। सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वह MSME की जमीनी हकीकत को समझे और ऐसी नीतियां बनाएँ जो वास्तव में उनके विकास को गति दे सकें।

**निष्कर्ष**

‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की राह पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन असली सफलता तभी मिलेगी जब हमारी नीतियां सभी स्तरों के व्यवसायों, विशेषकर MSME, की आवश्यकताओं को पूरा करेंगी। MSME की जमीन में 40% हिस्सेदारी की मांग एक दूरदर्शी कदम है जो देश के औद्योगिक भविष्य को मजबूत कर सकता है। इस मांग पर सकारात्मक प्रतिक्रिया से न केवल MSME क्षेत्र को लाभ होगा, बल्कि भारत ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य की ओर भी एक कदम और आगे बढ़ेगा।

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