कर्नाटक में कुर्सी का खेल: सिद्धारमैया का ‘हाईकमान’ पर भरोसा, कांग्रेस में मची खलबली – AajTak

कर्नाटक में कुर्सी का खेल: सिद्धारमैया का ‘हाईकमान’ पर भरोसा, कांग्रेस में मची खलबली

**कर्नाटक का नेतृत्व** आज एक बड़े राजनीतिक चौराहे पर खड़ा है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद, राज्य में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रहा सस्पेंस अब भी बरकरार है। इस बीच, पार्टी के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने एक स्पष्ट संकेत दिया है कि वे पार्टी आलाकमान के फैसले को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनके इस बयान ने कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल अन्य नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच हलचल मचा दी है।

सिद्धारमैया, जो कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं और पार्टी के एक प्रभावशाली नेता माने जाते हैं, ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा, “हाईकमान जो कहेगा, वही मानूंगा।” यह सीधा और बिना किसी लाग-लपेट के दिया गया बयान, पार्टी के भीतर चल रही अनिश्चितता को कम करने और नेतृत्व के प्रति अपनी निष्ठा को प्रदर्शित करने के उनके प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इस बयान ने सीधे तौर पर डी.के. शिवकुमार जैसे अन्य दावेदारों की महत्वाकांक्षाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जो मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं।

कांग्रेस ने कर्नाटक में 135 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया है, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक बड़ा झटका था। इस जीत का श्रेय काफी हद तक कांग्रेस के नेताओं, खासकर सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की ताबड़तोड़ रैलियों और प्रचार अभियानों को दिया जा रहा है। हालांकि, जीत की खुशी के बीच, मुख्यमंत्री पद का ताज किसे पहनाया जाएगा, यह सवाल पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री पद के लिए दो मुख्य दावेदार हैं: सिद्धारमैया और कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार। दोनों ही नेताओं की पार्टी में मजबूत पकड़ है और दोनों के समर्थकों की संख्या भी अच्छी खासी है। सिद्धारमैया, एक अनुभवी प्रशासक और दलित वोट बैंक में अपनी पैठ के लिए जाने जाते हैं, जबकि डी.के. शिवकुमार, एक कद्दावर नेता माने जाते हैं और राज्य के वोक्कालिंगा समुदाय में उनका काफी प्रभाव है।

पार्टी नेतृत्व इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच लगातार बैठकें चल रही हैं। कर्नाटक से चुने गए नवनिर्वाचित विधायकों की राय जानने के लिए पार्टी ने पर्यवेक्षक भी भेजे थे, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट आलाकमान को सौंप दी है। इन रिपोर्ट्स और पार्टी के आंतरिक सर्वेक्षणों के आधार पर ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।

सिद्धारमैया का ‘हाईकमान जो कहेगा वही मानूंगा’ वाला बयान कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि वे पार्टी के नियमों और अनुशासन को समझते हैं और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर पार्टी हित को रखते हैं। यह बयान उन अफवाहों पर भी विराम लगाता है जिनमें कहा जा रहा था कि सिद्धारमैया अपने पद को लेकर अड़े हुए हैं।

दूसरी ओर, डी.के. शिवकुमार भी लगातार अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। उन्होंने हाल ही में कहा था कि कांग्रेस में संगठन को मजबूत करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की है और पार्टी के हित में काम किया है। उनका यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से यह जताने का प्रयास है कि मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी भी मजबूत दावेदारी है।

कांग्रेस के भीतर इस खींचतान का फायदा उठाने की कोशिश अन्य राजनीतिक दल भी कर सकते हैं। भाजपा, जो कर्नाटक में विपक्ष में बैठी है, कांग्रेस के इस आंतरिक मतभेद पर नजर बनाए हुए है। हालांकि, कांग्रेस का यह प्रयास रहता है कि इस तरह के फैसलों को जल्द से जल्द निपटा लिया जाए ताकि सरकार के कामकाज पर कोई असर न पड़े।

इस पूरे घटनाक्रम में, पार्टी आलाकमान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, जो खुद कर्नाटक से हैं, और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी इस निर्णय में अहम भूमिका निभाएंगे। उन्हें न केवल दोनों प्रमुख दावेदारों के समर्थकों को शांत करना होगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जो भी फैसला लिया जाए, वह पार्टी के दीर्घकालिक हित में हो और राज्य में एक स्थिर सरकार का गठन हो सके।

आगे क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या सिद्धारमैया को दूसरा मौका मिलेगा, या डी.के. शिवकुमार पहली बार मुख्यमंत्री बनेंगे? या फिर कोई तीसरा नाम सामने आएगा? सिद्धारमैया के बयान ने निश्चित रूप से खेल को कांग्रेस नेतृत्व के पाले में डाल दिया है। पार्टी अब इस चुनौती का सामना कैसे करती है, यह देखना होगा।

कर्नाटक में जो भी मुख्यमंत्री बनेगा, उसके सामने कई चुनौतियां होंगी। राज्य की आर्थिक स्थिति, किसानों के मुद्दे, और विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन बनाना, ये कुछ ऐसी समस्याएं हैं जिनका उसे सामना करना पड़ेगा। कांग्रेस ने चुनाव प्रचार के दौरान कई वादे किए हैं, और सत्ता में आने के बाद उन वादों को पूरा करने का दबाव भी होगा।

संक्षेप में, कर्नाटक का मुख्यमंत्री पद का चयन पार्टी के भीतर एक अहम राजनीतिक दांव-पेंच है। सिद्धारमैया के बयान ने इस खेल में एक नया मोड़ ला दिया है, और अब सबकी निगाहें कांग्रेस आलाकमान के फैसले पर टिकी हैं। कर्नाटक का भविष्य, अगले कुछ दिनों में लिए जाने वाले इस महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णय पर निर्भर करेगा।

  • मुख्यमंत्री पद के लिए सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार प्रमुख दावेदार।
  • कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में हासिल की शानदार जीत।
  • सिद्धारमैया ने आलाकमान के फैसले को स्वीकार करने का दिया आश्वासन।
  • पार्टी नेतृत्व में दिल्ली में लगातार बैठकें जारी।
  • विधायकों की राय और पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर होगा अंतिम निर्णय।
  • भाजपा नजर बनाए हुए है कांग्रेस के आंतरिक राजनीतिक घटनाक्रम पर।
  • आलाकमान के सामने दोनों गुटों को साधने की चुनौती।

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