भारत में मोटापे की समस्या: ‘लाइफस्टाइल’ नहीं, एक क्रॉनिक बीमारी है मोटापा? जानिए एक्सपर्ट की राय – Patrika News

भारत में मोटापे की समस्या: ‘लाइफस्टाइल’ नहीं, एक क्रॉनिक बीमारी है मोटापा? जानिए एक्सपर्ट की राय

**मोटापा एक बीमारी** के रूप में भारत में तेजी से फैल रहा है, और अब विशेषज्ञ इसे केवल जीवनशैली की समस्या मानने से इनकार कर रहे हैं। पहले जहाँ मोटापे को अक्सर खराब खान-पान और शारीरिक निष्क्रियता का परिणाम माना जाता था, वहीं अब इसके पीछे छुपे गहरे कारणों और इसे एक क्रॉनिक (दीर्घकालिक) बीमारी के रूप में समझने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह सिर्फ ‘थोड़ा अधिक वजन’ नहीं है, बल्कि एक जटिल स्वास्थ्य समस्या है जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

**मोटापा: सिर्फ ‘लाइफस्टाइल’ का खेल नहीं?**

अक्सर सुनने में आता है कि “आजकल की लाइफस्टाइल ऐसी ही है, इसलिए मोटापा बढ़ रहा है”। यह बात काफी हद तक सही भी है, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है। शहरीकरण, भागदौड़ भरी जिंदगी, जंक फूड की आसान उपलब्धता, स्क्रीन टाइम का बढ़ना – ये सभी कारक निश्चित रूप से मोटापे को बढ़ावा देते हैं। लेकिन विशेषज्ञ अब इस बात पर प्रकाश डाल रहे हैं कि इन बाहरी कारकों के अलावा, कई आंतरिक और जटिल कारण भी मोटापे को जन्म देते हैं, जो इसे एक क्रॉनिक बीमारी की श्रेणी में लाते हैं।

**जानें एक्सपर्ट्स की राय:**

देश के प्रमुख एंडोक्रिनोलॉजिस्ट (अंतःस्रावी रोग विशेषज्ञ) डॉ. आर. के. वर्मा का कहना है, “मोटापा एक बहुआयामी बीमारी है। इसमें सिर्फ कैलोरी का सेवन और खर्च ही महत्वपूर्ण नहीं है। हार्मोनल असंतुलन, आनुवंशिकी (जेनेटिक्स), पर्यावरणीय कारक, यहाँ तक कि आपकी आंतों में रहने वाले सूक्ष्मजीव (gut microbiome) भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब इन कारकों का संतुलन बिगड़ता है, तो शरीर में फैट का जमाव असामान्य रूप से होने लगता है, जिसे सिर्फ ‘लाइफस्टाइल’ के नाम पर खारिज नहीं किया जा सकता।”

इसी तरह, एक प्रसिद्ध पोषण विशेषज्ञ, डॉ. सुनीता मेहता का मानना है, “हमारा शरीर एक जटिल मशीन की तरह है। जब इसे सही पोषक तत्व नहीं मिलते, या जब यह लगातार तनाव में रहता है, तो यह खुद को बचाने के तरीके ढूंढता है, जिसमें फैट को स्टोर करना भी शामिल है। कई बार, हमारी आंतें भी गलत सिग्नल भेजती हैं, जिससे हमें अधिक खाने की इच्छा होती है, भले ही हमें भूख न लगी हो। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो एक बार शुरू होने के बाद खुद से रुकना मुश्किल हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे मधुमेह या उच्च रक्तचाप जैसी क्रॉनिक बीमारियां।”

**मोटापे को क्रॉनिक बीमारी क्यों माना जा रहा है?**

क्रॉनिक बीमारी वह होती है जो लंबे समय तक रहती है और आमतौर पर पूरी तरह से ठीक नहीं होती, बल्कि प्रबंधित की जाती है। मोटापे के मामले में भी यही सच है। एक बार जब किसी व्यक्ति का वजन एक निश्चित स्तर से ऊपर चला जाता है, तो शरीर के मेटाबॉलिज्म (चयापचय) में बदलाव आ जाता है। शरीर फैट को स्टोर करने के लिए अनुकूलित हो जाता है, और वजन कम करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, मोटापे को क्रॉनिक बीमारी मानने के मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • **आनुवंशिक प्रवृत्ति:** कुछ लोगों में मोटापे की प्रवृत्ति आनुवंशिक होती है। उनके शरीर में ऐसे जीन होते हैं जो उन्हें फैट को अधिक कुशलता से स्टोर करने और ऊर्जा को कम खर्च करने के लिए प्रेरित करते हैं।
  • **हार्मोनल प्रभाव:** हंगर हार्मोन (जैसे घ्रेलिन) और संतुष्टि हार्मोन (जैसे लेप्टिन) का असंतुलन मोटापे में एक बड़ी भूमिका निभाता है। यह असंतुलन शरीर को लगातार भूख लगने का संकेत दे सकता है।
  • **मेटाबोलिक अनुकूलन:** वजन कम करने के प्रयासों के दौरान, शरीर अक्सर अपने मेटाबॉलिज्म को धीमा कर देता है, जिससे वजन कम करना और भी मुश्किल हो जाता है। यह एक प्रकार का ‘सुरक्षा तंत्र’ है जो शरीर को लगता है कि भोजन की कमी हो रही है।
  • **दीर्घकालिक जटिलताएं:** मोटापे के कारण टाइप 2 मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, स्लीप एपनिया, जोड़ों का दर्द और कुछ प्रकार के कैंसर जैसी कई अन्य गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। ये सभी क्रॉनिक स्थितियां हैं।
  • **मनोवैज्ञानिक कारक:** तनाव, अवसाद और भावनात्मक खान-पान (emotional eating) भी मोटापे को बढ़ा सकते हैं और इसे नियंत्रित करना कठिन बना सकते हैं।

**बदलती मानसिकता की आवश्यकता:**

यदि मोटापे को एक क्रॉनिक बीमारी के रूप में देखा जाए, तो समाज की मानसिकता में बदलाव आना आवश्यक है। इसे व्यक्ति की ‘आलस’ या ‘इच्छाशक्ति की कमी’ के रूप में देखना बंद करना होगा। इसके बजाय, इसके लिए चिकित्सा सहायता, पोषण विशेषज्ञ की सलाह, और एक समग्र उपचार योजना की आवश्यकता होगी।

डॉ. वर्मा आगे कहते हैं, “हमें मोटापे के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। मरीजों को शर्मिंदा करने के बजाय, हमें उन्हें सही जानकारी और उपचार प्रदान करना चाहिए। दवाओं, सर्जरी, और जीवनशैली में बदलाव का एक संयोजन अक्सर सबसे प्रभावी होता है।”

**निष्कर्ष:**

भारत में मोटापे की बढ़ती समस्या को केवल ‘लाइफस्टाइल’ का परिणाम मानकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। यह एक जटिल क्रॉनिक बीमारी है जिसके लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण और चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता है। विशेषज्ञ अब इस ओर इशारा कर रहे हैं कि इस बीमारी की गहरी समझ और सही उपचार ही इस राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट से निपटने का एकमात्र रास्ता है। लोगों को जागरूक होना होगा कि मोटापा सिर्फ बाहरी दिखावट का मामला नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है जिसका सामना वैज्ञानिक और औषधीय सहायता से किया जाना चाहिए।

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