कल तक आरोपी, आज सांसद! बांग्लादेश में सत्ता का गजब खेल कैसे पलटी तीन नेताओं की किस्मत – ABP News

बांग्लादेशी सियासत: पलटी किस्मत, कल के आरोपी आज बने सत्ता के धुरंधर

**सत्ता परिवर्तन** बांग्लादेश की राजनीति में एक बार फिर गजब का खेल देखने को मिला है। वह तीन नेता, जिन्हें कल तक सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा कटघरे में खड़ा किया गया था, आज देश के सबसे शक्तिशाली सदन, संसद के सदस्य बन गए हैं। यह अभूतपूर्व उलटफेर न केवल आम नागरिकों को बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों को भी अचंभित कर रहा है। कैसे हुआ यह सारा ड्रामा, और किन वजहों ने इन नेताओं की किस्मत का पहिया घुमाया, आइए जानते हैं विस्तार से।

बांग्लादेश की राजनीति हमेशा से ही उतार-चढ़ाव भरी रही है। सत्ता के गलियारों में कब कौन सा खिलाड़ी पाला बदल ले, यह कहना मुश्किल होता है। लेकिन इस बार का प्रकरण कुछ ज्यादा ही चौंकाने वाला है। जिन तीन नेताओं की हम बात कर रहे हैं, उनके ऊपर गंभीर आरोप लगे थे, जिनमें भ्रष्टाचार, देशद्रोह और सत्ता के दुरुपयोग जैसे संगीन इल्जाम शामिल थे। उन्हें न केवल अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, बल्कि सार्वजनिक रूप से उनकी छवि भी धूमिल की गई। ऐसे में, उनका राजनीतिक भविष्य लगभग समाप्त माना जा रहा था।

लेकिन सियासत में ‘कुछ भी संभव’ है, यह कहावत बांग्लादेश में एक बार फिर चरितार्थ हुई है। आम चुनाव के नतीजों ने सबको हिलाकर रख दिया। जिन पार्टियों और नेताओं को हाशिए पर धकेला जा रहा था, उन्हें जनता ने अभूतपूर्व समर्थन दिया। इन समर्थन के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं।

  • जनता का मिजाज: हो सकता है कि जनता सत्ताधारी दल से नाराज हो और बदलाव चाहती हो। ऐसे में, जिन नेताओं को पहले दबाया गया, वे जनता के असंतोष का चेहरा बन गए।
  • राजनीतिक पैंतरेबाजी: सत्ता पक्ष ने भी अपनी रणनीतियों में बदलाव किया होगा। चुनाव से ठीक पहले, विरोधियों को कमजोर करने या उन्हें राष्ट्रीय मंच पर वापस लाने के लिए कुछ ऐसे समझौते हुए होंगे, जिनके बारे में आम जनता को जानकारी नहीं है।
  • कानूनी दांव-पेच: कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जहां कानूनी प्रक्रियाएं राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित होती हैं। यदि नेताओं के खिलाफ आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हो पाए या उनमें कोई तकनीकी खामी रह गई, तो वे बरी हो सकते हैं और अपनी राजनीतिक पारी फिर से शुरू कर सकते हैं।
  • राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दबाव: कभी-कभी ऐसे फैसले राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे दबाव का परिणाम भी हो सकते हैं। लोकतंत्र की बहाली या निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कुछ ऐसे कदम उठाने पड़ सकते हैं, जो सामान्य परिस्थितियों में न उठाए जाते।

इन तीन नेताओं की कहानी एक मिसाल है कि कैसे बांग्लादेश की राजनीति में सत्ता का खेल खेला जाता है। कल तक जिन्हें ‘आरोपी’ के तौर पर देखा जाता था, आज वे ‘सांसद’ की हैसियत से सदन में अपनी बात रख रहे हैं। यह दिखाता है कि किस तरह से राजनीतिक समीकरण रातोंरात बदल सकते हैं।

एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इन नेताओं के दोबारा संसद पहुंचने से देश की नीतियों और कानून-व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा। क्या वे अपने अतीत के आरोपों से मुक्त होकर देश सेवा करेंगे, या फिर उनके फिर से सत्ता में आने से पुरानी समस्याएं फिर से उभरेंगी? यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

यह घटनाक्रम हमें सिखाता है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हर पहलू पर विचार करना चाहिए। राजनीति में कोई भी स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता। आज जो सड़क पर है, कल वह सत्ता के शिखर पर हो सकता है, और जो आज शिखर पर है, कल वह हाशिए पर धकेला जा सकता है। बांग्लादेश का यह ‘गजब खेल’ दुनिया भर की राजनीति के लिए एक अध्ययन का विषय है।

यह समझना आवश्यक है कि जनता की आवाज और चुनावी नतीजे ही अंततः किसी भी राजनीतिक खेल का फैसला करते हैं। इन तीनों नेताओं की किस्मत का पलटना इस बात का प्रमाण है कि जनता के फैसले को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उम्मीद है कि वे अपनी नई भूमिका में देशहित के लिए काम करेंगे और अपने ऊपर लगे आरोपों को भी सार्वजनिक मंच पर स्पष्ट करेंगे, ताकि जनता का विश्वास उन पर बना रहे। यह सिर्फ बांग्लादेश की सियासत का ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस पहलू का भी प्रतिबिंब है, जहां जनता जनार्दन होती है।

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