बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर: जेल से सीधे सत्ता के शिखर तक पहुंचे ये तीन दिग्गज नेता

बांग्लादेश की राजनीति में आया सत्ता का महासंग्राम

बांग्लादेश की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसकी कल्पना शायद कुछ समय पहले तक किसी ने नहीं की होगी। ढाका की सड़कों पर मचे बवाल और शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद वहां की सत्ता का पूरा समीकरण ही बदल गया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जो नेता कल तक अदालतों के चक्कर काट रहे थे या सलाखों के पीछे थे, आज वे देश की तकदीर लिखने की तैयारी कर रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति में आए इस ‘पॉवर शिफ्ट’ ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

पिछले कुछ दशकों से बांग्लादेश में अवामी लीग का वर्चस्व था, लेकिन अचानक हुए तख्तापलट ने विपक्ष के लिए रास्ते खोल दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम में तीन प्रमुख नेताओं की किस्मत सबसे ज्यादा चमकी है, जो अब सत्ता के केंद्र में नजर आ रहे हैं।

जेल से रिहाई और फिर सत्ता की ओर कदम

बांग्लादेश की राजनीति के इतिहास में यह पहली बार देखा जा रहा है कि इतनी तेजी से कानूनी प्रक्रियाएं बदली हैं। राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन के आदेश के बाद मुख्य विपक्षी नेता और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को जेल से रिहा कर दिया गया। खालिदा जिया लंबे समय से भ्रष्टाचार के आरोपों में नजरबंद थीं। उनके साथ ही कई अन्य नेताओं पर लगे आरोप भी अब बेमानी साबित हो रहे हैं।

  • खालिदा जिया: बीएनपी प्रमुख की वापसी ने कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है।
  • तारिक रहमान: निर्वासन में रह रहे तारिक की भी देश वापसी की राह आसान हो गई है।
  • जमात-ए-इस्लामी के नेता: जिन नेताओं पर प्रतिबंध लगा था, अब वे मुख्यधारा में लौट रहे हैं।

सत्ता का गजब खेल: कल के ‘गुनहगार’ आज के ‘सांसद’

शेख हसीना के शासनकाल में जिन नेताओं को ‘राजद्रोही’ या ‘अपराधी’ करार दिया गया था, आज वे जनता के बीच नायक बनकर उभर रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति में यह बदलाव किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। अंतरिम सरकार के गठन की चर्चाओं के बीच इन नेताओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जो लोग कल तक कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे थे, वे अब नए चुनावों में सांसद और मंत्री बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं।

विद्यार्थी आंदोलनों ने जिस तरह से व्यवस्था परिवर्तन की मांग की, उसने पुराने ढर्रे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। अब सेना और छात्र नेताओं के बीच चल रही बातचीत इस बात की तस्दीक करती है कि आने वाले समय में बांग्लादेश की राजनीति में उन चेहरों का दबदबा रहेगा जिन्हें हसीना सरकार ने हाशिए पर धकेल दिया था।

क्या यह लोकतंत्र की नई शुरुआत है?

बांग्लादेश में इस समय अनिश्चितता का माहौल तो है, लेकिन विपक्ष इसे लोकतंत्र की बहाली के रूप में देख रहा है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात को लेकर चिंतित है कि क्या यह बदलाव शांतिपूर्ण होगा या हिंसा का नया दौर शुरू होगा।

बांग्लादेश की राजनीति में आए इस भूचाल के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • शेख हसीना का इस्तीफा और भारत में शरण लेना।
  • नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का सलाहकार नियुक्त करना।
  • विपक्षी दलों के सभी राजनीतिक कैदियों की तत्काल रिहाई।
  • पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका में बड़े पैमाने पर फेरबदल।

अंततः, बांग्लादेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां से उसकी दिशा और दशा दोनों तय होनी है। क्या ये तीन नेता, जिनकी किस्मत ने रातों-रात पलटी मारी है, देश को स्थिरता दे पाएंगे? यह सवाल आज हर बांग्लादेशी के मन में है। बांग्लादेश की राजनीति का यह नया अध्याय आने वाले दशकों के लिए दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को भी प्रभावित करेगा।

जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें करीब आएंगी, यह देखना दिलचस्प होगा कि कल के आरोपी रहे ये नेता जनता का विश्वास जीतने में कितने सफल होते हैं। फिलहाल, ढाका की हवाओं में बदलाव की महक है और सत्ता का खेल अब पूरी तरह से नए खिलाड़ियों के हाथ में आ चुका है।

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