- Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- नीति आयोग का ‘विजन 2047’ और ऑटो सेक्टर का भविष्य।
- Electric Vehicles (EV) के जरिए ग्लोबल लीडर बनने की तैयारी।
- PLI स्कीम और मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में भारत की ग्रोथ।
- ग्रीन मोबिलिटी और सस्टेनेबल ट्रांसपोर्टेशन पर फोकस।
- एक्सपोर्ट मार्केट में भारतीय कंपनियों की बढ़ती धमक।
भारतीय ऑटो इंडस्ट्री आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ से वह न केवल देश की इकोनॉमी को नई रफ्तार दे सकती है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मैन्युफैक्चरिंग बेंचमार्क भी सेट कर सकती है। नीति आयोग ने हाल ही में एक कंप्रिहेंसिव रोडमैप पेश किया है, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत को दुनिया का ऑटोमोबाइल लीडर बनाना है। इस विजन में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), हाइड्रोजन फ्यूल और एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) जैसी टेक्नोलॉजी पर विशेष जोर दिया गया है।
भारतीय ऑटो सेक्टर: ग्लोबल लीडर बनने की ओर कदम
नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले एक दशक में भारतीय ऑटो बाजार दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल मार्केट बनने के लिए पूरी तरह तैयार है। वर्तमान में, भारत टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर मैन्युफैक्चरिंग में पहले से ही ग्लोबल लीडर है, लेकिन अब फोकस पैसेंजर व्हीकल्स और कमर्शियल व्हीकल्स के ग्लोबल एक्सपोर्ट पर शिफ्ट हो रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि ‘Make in India’ पहल के तहत भारतीय कारों को दुनिया के हर कोने में पहुँचाया जाए।
नीति आयोग का मानना है कि यदि भारत को $5 ट्रिलियन इकोनॉमी का सपना पूरा करना है, तो ऑटोमोबाइल सेक्टर को इसमें कम से कम 12-15% का योगदान देना होगा। इसके लिए सरकार NITI Aayog के माध्यम से ऐसी नीतियां बना रही है जो ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) को बढ़ावा दें और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करें।
EV और ग्रीन मोबिलिटी: भविष्य का असली गेम-चेंजर
जब हम भविष्य की बात करते हैं, तो इलेक्ट्रिक व्हीकल्स का जिक्र होना लाजिमी है। भारतीय ऑटो सेक्टर में EV का एडॉप्शन पिछले दो सालों में काफी तेजी से बढ़ा है। नीति आयोग ने अपने रोडमैप में स्पष्ट किया है कि 2030 तक 70% कमर्शियल कारें, 30% प्राइवेट कारें, 40% बसें और 80% टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर सेल्स इलेक्ट्रिक होनी चाहिए।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ‘FAME-II’ स्कीम और ‘PLI (Production Linked Incentive)’ जैसी योजनाएं काफी कारगर साबित हो रही हैं। टाटा मोटर्स, महिंद्रा और ओला इलेक्ट्रिक जैसी देसी कंपनियां अब ग्लोबल ब्रांड्स को कड़ी टक्कर दे रही हैं। चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए सरकार पीपीपी (PPP) मॉडल पर काम कर रही है, जिससे रेंज एंग्जायटी (Range Anxiety) की समस्या खत्म हो सके।
| सेगमेंट | लक्ष्य (2030 तक EV शेयर) | प्रमुख चुनौतियां |
|---|---|---|
| टू-व्हीलर | 80% | बैटरी कॉस्ट और रेंज |
| थ्री-व्हीलर | 80% | चार्जिंग नेटवर्क |
| प्राइवेट कार्स | 30% | अफोर्डेबिलिटी |
| कमर्शियल बसें | 40% | हाई इनिशियल इन्वेस्टमेंट |
मैन्युफैक्चरिंग हब और PLI स्कीम का जादू
भारतीय ऑटो सेक्टर को ग्लोबल हब बनाने के लिए सरकार ने PLI स्कीम के तहत करोड़ों रुपये का इंसेंटिव आवंटित किया है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में एडवांस्ड ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी का प्रोडक्शन शुरू करना है। अब तक हम कई कंपोनेंट्स के लिए चीन और अन्य देशों पर निर्भर थे, लेकिन अब ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत सेमीकंडक्टर्स और लिथियम-आयन बैटरी सेल्स का उत्पादन भारत में ही शुरू करने की तैयारी है।
इससे न केवल प्रोडक्शन कॉस्ट कम होगी, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। फॉक्सवैगन, टोयोटा और हुंडई जैसी दिग्गज ग्लोबल कंपनियां अब भारत को अपने एक्सपोर्ट बेस की तरह देख रही हैं। TimesNews360 की एक रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्य ऑटो हब के रूप में तेजी से उभर रहे हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और स्मार्ट कनेक्टिविटी का रोल
सड़कें और हाईवे किसी भी देश की प्रगति की जीवन रेखा होती हैं। भारत में एक्सप्रेसवे का जाल जिस तेजी से बिछ रहा है, उससे लॉजिस्टिक्स की लागत कम हुई है। नीति आयोग के रोडमैप में ‘स्मार्ट हाईवे’ और ‘इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम’ पर जोर दिया गया है। भारतीय ऑटो कंपनियां अब गाड़ियों में 5G कनेक्टिविटी, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और AI-बेस्ड फीचर्स दे रही हैं, जो ग्लोबल स्टैंडर्ड के अनुरूप हैं।
सस्टेनेबल फ्यूल: हाइड्रोजन और एथेनॉल ब्लेंडिंग
सिर्फ इलेक्ट्रिक ही नहीं, बल्कि भारत अन्य अल्टरनेटिव फ्यूल्स पर भी काम कर रहा है। ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत भारतीय ऑटो इंडस्ट्री अब हाइड्रोजन फ्यूल सेल व्हीकल्स (FCEV) की टेस्टिंग कर रही है। इसके अलावा, एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (E20) के जरिए पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे क्रूड ऑयल इंपोर्ट पर निर्भरता कम होगी और पर्यावरण को भी फायदा होगा।
चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि रास्ता इतना आसान नहीं है। भारतीय ऑटो सेक्टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती बैटरी रिसाइकिलिंग और रॉ मटेरियल (जैसे कोबाल्ट और लिथियम) की उपलब्धता है। इसके लिए नीति आयोग ने ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ मॉडल का सुझाव दिया है, जहाँ पुरानी बैटरियों को रिसाइकिल करके नया रॉ मटेरियल प्राप्त किया जा सके।
एक और बड़ी चुनौती स्किल्ड वर्कफोर्स की है। जैसे-जैसे गाड़ियां हाई-टेक हो रही हैं, वैसे-वैसे हमें ऐसे इंजीनियर्स और टेक्निशियंस की जरूरत है जो सॉफ्टवेयर और कोडिंग को समझते हों। सरकार ने इसके लिए स्किल इंडिया मिशन के तहत कई ट्रेनिंग प्रोग्राम्स भी शुरू किए हैं।
निष्कर्ष: क्या भारत बनेगा ऑटो किंग?
निष्कर्ष के तौर पर, भारतीय ऑटो सेक्टर में वो पोटेंशियल है कि वह जर्मनी और जापान जैसे देशों को पीछे छोड़ दे। नीति आयोग का रोडमैप केवल एक डॉक्यूमेंट नहीं है, बल्कि यह एक विजन है जो भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है। अगर हम टेक्नोलॉजी, पॉलिसी सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग एफिशिएंसी को सही तरीके से मिला दें, तो वह दिन दूर नहीं जब दुनिया की हर तीसरी कार ‘Made in India’ होगी।
आने वाले समय में भारतीय ऑटो बाजार में हमें कई बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। अफोर्डेबल इलेक्ट्रिक कार्स, बेहतर सेफ्टी फीचर्स और सस्टेनेबल मोबिलिटी भारत की नई पहचान बनेगी। ऑटो सेक्टर की इस विकास यात्रा में हर भारतीय नागरिक और निवेशक के लिए बड़े अवसर छिपे हैं।
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