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सियासी चर्चा: सोशल मीडिया पर पाबंदियां और हिमंता बिस्व सरमा की राजनीति का सच

Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?

  • सोशल मीडिया पर बढ़ती सरकारी पाबंदियों का विस्तृत विश्लेषण।
  • असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा की ‘हेट पॉलिटिक्स’ और उनके हालिया बयानों पर चर्चा।
  • न्यूज़लॉन्ड्री की ‘एनएल चर्चा 410’ के मुख्य बिंदुओं का सारांश।
  • फ्री स्पीच और डिजिटल रेगुलेशन के बीच छिड़ी जंग का गहरा असर।
  • भारतीय लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति।

सियासी चर्चा आज के दौर में केवल चाय की दुकानों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह अब हमारे स्मार्टफोन की स्क्रीन और सोशल मीडिया फीड्स पर हावी हो चुकी है। भारत में जिस तरह से डिजिटल इकोसिस्टम बदल रहा है, उसने सरकार और नागरिकों के बीच एक नई तरह की खींचतान पैदा कर दी है। हाल ही में न्यूज़लॉन्ड्री की ‘एनएल चर्चा 410’ में इस मुद्दे पर विस्तार से बात की गई कि कैसे सोशल मीडिया पर पाबंदियां बढ़ रही हैं और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा की राजनीति एक खास दिशा में मुड़ती जा रही है।

सोशल मीडिया पर पाबंदियां: डिजिटल सेंसरशिप का नया दौर?

पिछले कुछ सालों में हमने देखा है कि भारत सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के बीच एक ‘कोल्ड वॉर’ जैसी स्थिति बनी हुई है। सियासी चर्चा का केंद्र अब यह बन गया है कि क्या सरकार ‘IT Rules 2021’ के नाम पर स्वतंत्र आवाज़ों को दबाने की कोशिश कर रही है? हाल ही में कई पत्रकारों और यूट्यूबर्स के अकाउंट्स को सस्पेंड किया गया या उनके कंटेंट पर स्ट्राइक दी गई। यह सब तब हो रहा है जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ही वह आखिरी जगह बचे थे जहाँ लोग खुलकर अपनी बात रख पा रहे थे।

जब हम सोशल मीडिया पर पाबंदियों की बात करते हैं, तो हमें ‘ब्रॉडकास्टिंग बिल’ जैसे कानूनों को समझना होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसे कानून कंटेंट क्रिएटर्स की कमर तोड़ सकते हैं। अगर हर छोटे यूट्यूबर को खुद को रजिस्टर करना पड़ेगा, तो फ्री स्पीच का क्या होगा? यह सियासी चर्चा का एक बहुत ही क्रिटिकल पॉइंट है क्योंकि न्यूज़लॉन्ड्री जैसे स्वतंत्र संस्थानों ने बार-बार इस खतरे की ओर इशारा किया है।

हिमंता बिस्व सरमा: हेट पॉलिटिक्स या चुनावी रणनीति?

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्व सरमा आजकल नेशनल मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं। उनकी सियासी चर्चा अक्सर उनके उन बयानों के इर्द-गिर्द घूमती है जिन्हें आलोचक ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में रखते हैं। हाल ही में उन्होंने ‘मियाँ मुसलमानों’ और राज्य की डेमोग्राफी को लेकर कई तीखी टिप्पणियां की हैं। सरमा का तर्क है कि वह असम की संस्कृति को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन विपक्ष और सिविल सोसाइटी इसे ध्रुवीकरण की राजनीति करार देती है।

एनएल चर्चा 410 में यह बात साफ तौर पर उभर कर आई कि हिमंता बिस्व सरमा की राजनीति अब केवल असम तक सीमित नहीं है। वह खुद को बीजेपी के एक फायरब्रांड नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जो किसी भी मुद्दे पर सीधा और कड़ा रुख अपनाने से नहीं हिचकिचाते। लेकिन क्या यह रुख समाज में नफरत फैला रहा है? यह एक बड़ा सवाल है। हेट स्पीच के खिलाफ भारत के भारतीय संविधान में स्पष्ट प्रावधान हैं, लेकिन अक्सर सत्ता के करीब रहने वाले नेताओं पर ये नियम लागू नहीं होते दिखते।

स्वतंत्र पत्रकारिता और सत्ता का दबाव

आजकल की सियासी चर्चा में मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाना अनिवार्य हो गया है। मेनस्ट्रीम मीडिया या जिसे आज ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है, वह अक्सर सरकार की लाइन पर ही चलता है। ऐसे में न्यूज़लॉन्ड्री जैसे संस्थान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ‘चर्चा 410’ में इसी बात पर ज़ोर दिया गया कि जब सरकार सोशल मीडिया पर शिकंजा कसती है, तो इसका सीधा असर उन पत्रकारों पर पड़ता है जो सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं।

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे X (पहले ट्विटर), फेसबुक और यूट्यूब अब केवल मनोरंजन के साधन नहीं रहे। ये राय बनाने के मशीन बन चुके हैं। जब सरकार किसी स्पेसिफिक कंटेंट को हटाने का आदेश देती है, तो वह केवल एक पोस्ट नहीं हटाती, बल्कि एक विमर्श (Narrative) को खत्म कर देती है। सियासी चर्चा को कंट्रोल करने की यह कोशिश लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

मुद्दासरकारी पक्षविपक्ष/स्वतंत्र मीडिया का पक्ष
सोशल मीडिया रेगुलेशनफेक न्यूज़ रोकना और सुरक्षासेंसरशिप और आवाज़ दबाना
हिमंता बिस्व सरमा के बयानसांस्कृतिक संरक्षणहेट स्पीच और ध्रुवीकरण
स्वतंत्र पत्रकारितासमान नियमों का पालनटारगेटेड अटैक्स और FIR

हिमंता बिस्व सरमा और ‘डेमोग्राफिक’ नैरेटिव

असम में घुसपैठ और मुस्लिम आबादी के बढ़ने को लेकर हिमंता बिस्व सरमा जिस तरह की सियासी चर्चा को हवा देते हैं, वह चुनाव के समय और भी आक्रामक हो जाती है। वे अक्सर ‘मियाँ’ समुदाय को टारगेट करते हैं, जो दशकों से असम में रह रहे हैं। उनके बयानों से ऐसा लगता है मानो असम की सभी समस्याओं की जड़ एक विशेष समुदाय है। न्यूज़लॉन्ड्री की चर्चा में पैनलिस्ट्स ने इस बात को हाईलाइट किया कि कैसे एक मुख्यमंत्री के पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर सकता है?

यह केवल असम की बात नहीं है, बल्कि पूरे भारत में इस तरह की राजनीति का एक पैटर्न सेट हो रहा है। विकास के मुद्दों से हटकर जब राजनीति धर्म और पहचान पर आधारित हो जाती है, तो सियासी चर्चा का स्तर गिर जाता है। TimesNews360 पर हम हमेशा ऐसे विषयों को प्रमुखता से उठाते हैं जो जनता के सरोकार से जुड़े हों।

सोशल मीडिया पाबंदियों का कानूनी पहलू

सरकार का तर्क है कि सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा अराजकता (Anarchy) है। फेक न्यूज़ की वजह से दंगे हो सकते हैं, इसलिए रेगुलेशन ज़रूरी है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब रेगुलेशन का इस्तेमाल केवल सत्ता की आलोचना करने वालों के खिलाफ किया जाता है। सियासी चर्चा में यह अक्सर देखा गया है कि जो लोग सरकार के पक्ष में हेट स्पीच फैलाते हैं, उन पर कार्रवाई बहुत धीमी होती है, जबकि आलोचना करने वालों के अकाउंट तुरंत ब्लॉक कर दिए जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि ‘असहमति का अधिकार’ (Right to Dissent) लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। न्यूज़लॉन्ड्री 410 एपिसोड में इस बात पर काफी बहस हुई कि कैसे एल्गोरिदम और सरकारी दबाव मिलकर एक ‘इको चैंबर’ बना रहे हैं जहाँ केवल एक ही तरह की विचारधारा को जगह मिलती है।

भविष्य की राह और हमारा उत्तरदायित्व

भारत में सियासी चर्चा को स्वस्थ बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि पत्रकारिता अपनी निष्पक्षता बनाए रखे। जब तक हम हिमंता बिस्व सरमा जैसे नेताओं के विवादास्पद बयानों को चैलेंज नहीं करेंगे और सोशल मीडिया पर बढ़ती पाबंदियों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएंगे, तब तक हमारा लोकतंत्र कमज़ोर होता रहेगा। डिजिटल युग में सूचना ही शक्ति है, और इस शक्ति का इस्तेमाल समाज को जोड़ने के लिए होना चाहिए, न कि तोड़ने के लिए।

अगर हम ‘एनएल चर्चा’ के इस एडिशन का विश्लेषण करें, तो एक बात साफ है: आने वाले समय में सोशल मीडिया पर नियंत्रण और भी सख्त हो सकता है। सरकार नए कानूनों के ज़रिए टेक कंपनियों को अपने इशारों पर नचाने की तैयारी में है। वहीं दूसरी तरफ, हिमंता बिस्व सरमा जैसे नेता अपने बयानों से ध्रुवीकरण की नई लकीर खींच रहे हैं। इन सबके बीच आम नागरिक को यह समझने की ज़रूरत है कि कौन सा नैरेटिव उसके हित में है और कौन सा उसे गुमराह कर रहा है।

सियासी चर्चा को खत्म करते हुए हमें यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब सवाल पूछने की आज़ादी हो। चाहे वह असम का कोई छोटा सा गांव हो या दिल्ली का सत्ता गलियारा, जवाबदेही हर जगह होनी चाहिए। न्यूज़लॉन्ड्री और अन्य स्वतंत्र मीडिया हाउस इसी जवाबदेही को तय करने का प्रयास कर रहे हैं, जिसे समर्थन देना हर जागरूक नागरिक का कर्तव्य है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, सोशल मीडिया पर पाबंदियां और हिमंता बिस्व सरमा की राजनीति, दोनों ही भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए बड़े संकेत हैं। जहाँ एक तरफ तकनीकी साधनों का उपयोग कंट्रोल के लिए किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ शब्दों का उपयोग समाज को बांटने के लिए हो रहा है। सियासी चर्चा को अब हमें आंकड़ों, तथ्यों और संविधान के चश्मे से देखने की ज़रूरत है, न कि भावनाओं और नफरत के आधार पर।

आने वाले चुनावों और विधायी बदलावों पर हमारी नज़र बनी रहेगी। आप भी अपनी राय कमेंट्स में ज़रूर बताएं और न्यूज़लॉन्ड्री जैसे प्लेटफॉर्म्स को सपोर्ट करें ताकि सच बोलने वाली आवाज़ें खामोश न हों। सियासी चर्चा में आपकी भागीदारी ही लोकतंत्र की असली ताकत है।

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