- Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- ऑटो सेक्टर का भारतीय जीडीपी में 7% से अधिक का योगदान।
- GST कलेक्शन में इस इंडस्ट्री की 15% की विशाल हिस्सेदारी।
- 3 करोड़ से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिला रोजगार।
- भारत बना दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पैसेंजर व्हीकल मार्केट।
- इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) क्रांति और भविष्य की संभावनाएं।
ऑटो सेक्टर आज के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था की वह रीढ़ बन चुका है, जिसके बिना विकास की कल्पना करना भी मुश्किल है। पिछले एक दशक में भारत ने ऑटोमोबाइल निर्माण के क्षेत्र में जो छलांग लगाई है, उसने न केवल देश के भीतर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारत का डंका बजा दिया है। हालिया रिपोर्ट्स और आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय ऑटो इंडस्ट्री अब केवल गाड़ियां बनाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह देश के रेवेन्यू और रोजगार का सबसे बड़ा जरिया बन चुकी है।
ऑटो सेक्टर: भारतीय अर्थव्यवस्था का नया इंजन
ऑटो सेक्टर भारत की जीडीपी (GDP) में लगभग 7.1% का योगदान देता है। अगर हम सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग जीडीपी की बात करें, तो इसमें इस सेक्टर की हिस्सेदारी 49% के करीब है। यह आंकड़े बताते हैं कि देश में होने वाले कुल औद्योगिक उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा सिर्फ गाड़ियों और उनके कलपुर्जों से आता है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल मार्केट बन चुका है, जिसने जापान और जर्मनी जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ दिया है।
टाइम्स न्यूज़ 360 के विशेष विश्लेषण के अनुसार, इस ग्रोथ के पीछे सरकार की अनुकूल नीतियां, बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का विकास और मध्यम वर्ग की बढ़ती क्रय शक्ति (Purchasing Power) है। भारत में जिस तरह से एक्सप्रेसवे और नेशनल हाईवे का जाल बिछाया जा रहा है, उसने लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर में नई जान फूंक दी है, जिसका सीधा फायदा ऑटोमोबाइल कंपनियों को मिल रहा है।
GST कलेक्शन में रिकॉर्डतोड़ योगदान
जब हम सरकारी खजाने की बात करते हैं, तो ऑटो सेक्टर का नाम सबसे ऊपर आता है। भारत के कुल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) कलेक्शन में इस इंडस्ट्री का योगदान 15% है। यह एक चौंकाने वाला आंकड़ा है क्योंकि यह दर्शाता है कि हर 100 रुपये के टैक्स में से 15 रुपये सिर्फ गाड़ियों की बिक्री और उनके सर्विसिंग से आ रहे हैं। महंगी एसयूवी (SUV) और लग्जरी कारों पर लगने वाले सेस (Cess) के कारण यह रेवेन्यू और भी बढ़ जाता है।
| Category | GST Contribution (Approx) | Employment Generation |
|---|---|---|
| Passenger Vehicles | High (28% + Cess) | Direct & Indirect |
| Two Wheelers | Significant | Mass Employment |
| Commercial Vehicles | Vital for Logistics | Drivers & Technicians |
| Electric Vehicles | Lower GST (5%) | Emerging Jobs |
3 करोड़ नौकरियों का सृजन: रोजगार का महाकुंभ
ऑटो सेक्टर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने देश के 3 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान की है। इसमें सिर्फ फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूर या इंजीनियर ही शामिल नहीं हैं, बल्कि डीलरशिप, सर्विस सेंटर, स्पेयर पार्ट्स की दुकानें, इंश्योरेंस कंपनियां और फाइनेंस सेक्टर के लोग भी जुड़े हुए हैं। ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री एक ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ पैदा करती है, यानी जब एक गाड़ी बिकती है, तो वह टायर बनाने वाली कंपनी से लेकर पेंट और स्टील बनाने वाली कंपनियों तक के लिए काम पैदा करती है।
आंकड़ों के अनुसार, अगले कुछ वर्षों में इस सेक्टर में 2 करोड़ और नई नौकरियां पैदा होने की संभावना है, बशर्ते हम ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी पकड़ और मजबूत करें। आत्मनिर्भर भारत अभियान और PLI Scheme (Production Linked Incentive) ने स्थानीय स्तर पर पुर्जों के निर्माण को बढ़ावा दिया है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई है और स्थानीय स्तर पर स्किल्ड लेबर की मांग बढ़ी है।
इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और भविष्य की चुनौतियां
ऑटो सेक्टर अब एक बड़े बदलाव (Transition) के दौर से गुजर रहा है। पारंपरिक पेट्रोल और डीजल इंजनों की जगह अब इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) ले रहे हैं। भारत सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक निजी कारों में 30%, कमर्शियल वाहनों में 70% और दोपहिया/तिपहिया वाहनों में 80% बिक्री इलेक्ट्रिक हो। यह बदलाव न केवल पर्यावरण के लिए अच्छा है, बल्कि यह भारत के कच्चे तेल के आयात बिल को कम करने में भी मदद करेगा।
टाटा मोटर्स, महिंद्रा और ओला इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियां इस रेस में सबसे आगे हैं। हालांकि, ईवी इंफ्रास्ट्रक्चर और चार्जिंग स्टेशनों की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती है। लेकिन जिस तेजी से पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत काम हो रहा है, उससे उम्मीद है कि अगले 5 सालों में भारत दुनिया का ईवी हब बन जाएगा। अधिक जानकारी के लिए आप TimesNews360 पर हमारे अन्य ऑटोमोबाइल लेख देख सकते हैं।
मेक इन इंडिया: ग्लोबल एक्सपोर्ट हब बनता भारत
भारत अब सिर्फ अपने लिए गाड़ियां नहीं बना रहा, बल्कि पूरी दुनिया को सप्लाई कर रहा है। मारुति सुजुकी, हुंडई और किआ जैसी कंपनियां भारत को अपने ग्लोबल एक्सपोर्ट हब के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में ‘मेड इन इंडिया’ कारों की भारी मांग है। ऑटो सेक्टर के माध्यम से भारत की यह सॉफ्ट पावर वैश्विक व्यापार में हमारी स्थिति को और मजबूत कर रही है।
कंज्यूमर सेंटिमेंट और प्रीमियम कारों का क्रेज
आजकल भारतीय ग्राहकों का टेस्ट बदल रहा है। लोग अब सिर्फ ‘माइलेज’ नहीं, बल्कि ‘सेफ्टी’ और ‘फीचर्स’ को तरजीह दे रहे हैं। यही कारण है कि कॉम्पैक्ट एसयूवी सेगमेंट में जबरदस्त उछाल देखा गया है। सुरक्षा मानकों (Global NCAP) में भारतीय कारों का प्रदर्शन सुधरा है, जिससे ग्राहकों का भरोसा घरेलू ब्रांड्स पर बढ़ा है। ऑटो सेक्टर में यह प्रीमियमनाइजेशन ट्रेंड कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को भी बढ़ा रहा है।
निष्कर्ष: क्या भारत बनेगा 5 ट्रिलियन इकोनॉमी?
बिना किसी संदेह के, ऑटो सेक्टर भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के सपने को पूरा करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सरकार द्वारा नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी और गति शक्ति योजना के माध्यम से इंफ्रास्ट्रक्चर पर दिया जा रहा जोर इस इंडस्ट्री को और रफ्तार देगा। चुनौतियां जैसे कि सेमीकंडक्टर चिप की कमी या कच्चे माल की बढ़ती कीमतें हमेशा बनी रहेंगी, लेकिन भारतीय ऑटो उद्योग ने बार-बार साबित किया है कि वह हर मुश्किल से उबर कर और मजबूत होकर निकल सकता है।
अंत में, ऑटो सेक्टर का विकास केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं और बेहतर जीवन स्तर का प्रतीक है। चाहे वह गांव में चलने वाला ट्रैक्टर हो या शहरों में दौड़ती इलेक्ट्रिक बसें, हर पहिया भारत की प्रगति की कहानी लिख रहा है। आने वाले समय में ग्रीन हाइड्रोजन और फ्लेक्स-फ्यूल जैसे नवाचार इस क्षेत्र को और भी अधिक सस्टेनेबल और प्रॉफिटेबल बनाएंगे।
ऑटो सेक्टर की इस यात्रा में सरकार, उद्योगपतियों और आम जनता का सामूहिक प्रयास ही इसे दुनिया का नंबर 1 ऑटोमोबाइल हब बनाने में सफल होगा। देश की इकोनॉमी को गियर में डालने का काम इस सेक्टर ने बखूबी किया है, अब जरूरत है इसे टॉप गियर में ले जाने की।