- Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर में कार एक्सपोर्ट की 33% की मेगा ग्रोथ।
- मारुति सुजुकी, हुंडई और किआ का विदेशी बाजारों में जलवा।
- मेड-इन-इंडिया कारों की डिमांड बढ़ने के पीछे के बड़े कारण।
- सरकार की PLI स्कीम और इंफ्रास्ट्रक्चर का एक्सपोर्ट पर असर।
- भविष्य के टारगेट और ग्लोबल मार्केट में भारत की नई पहचान।
कार एक्सपोर्ट के मोर्चे पर भारत ने इस साल जो कमाल कर दिखाया है, उसने पूरी दुनिया की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पिछले कुछ महीनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारतीय कार मैन्युफैक्चरर्स ने विदेशी बाजारों में झंडे गाड़ दिए हैं। 33% की यह भारी उछाल कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि ‘मेक इन इंडिया’ अब सिर्फ एक स्लोगन नहीं रह गया है, बल्कि एक ग्लोबल रियलिटी बन चुका है। भारतीय गाड़ियां अब केवल देश की ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर ही नहीं, बल्कि यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की चकाचौंध भरी सड़कों पर भी अपना दम दिखा रही हैं।
कार एक्सपोर्ट में 33% का उछाल: क्या कहते हैं आंकड़े?
भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए यह साल किसी सुनहरे दौर से कम नहीं है। हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले साल के मुकाबले इस साल कार एक्सपोर्ट में 33 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि देखी गई है। इसका सबसे बड़ा क्रेडिट उन टॉप कंपनियों को जाता है जिन्होंने अपनी प्रोडक्शन कैपेसिटी को न केवल बढ़ाया है, बल्कि इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को भी बखूबी मैच किया है।
आंकड़ों की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि पैसेंजर व्हीकल्स (PV) के सेगमेंट में सबसे ज्यादा ग्रोथ हुई है। भारतीय कंपनियों ने इस बार न केवल छोटी हैचबैक, बल्कि प्रीमियम SUVs और सेडान के एक्सपोर्ट में भी लंबी छलांग लगाई है। आज दुनिया भर में भारतीय कारों की डिमांड इसलिए बढ़ रही है क्योंकि ये गाड़ियां अफोर्डेबल होने के साथ-साथ अब फीचर्स के मामले में भी किसी ग्लोबल ब्रांड से पीछे नहीं हैं। आप TimesNews360 पर ऐसी ही और भी बिजनेस और ऑटो अपडेट्स पढ़ सकते हैं।
इन कंपनियों ने मारी बाजी
जब भी भारत से कार एक्सपोर्ट की बात आती है, तो मारुति सुजुकी का नाम सबसे ऊपर आता है। मारुति ने इस बार अपने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मारुति की फ्रोंक्स (Fronx) और ग्रैंड विटारा जैसी गाड़ियों को साउथ अफ्रीका और मिडल ईस्ट में काफी पसंद किया जा रहा है।
दूसरे नंबर पर हुंडई मोटर इंडिया का नाम आता है। हुंडई अपनी क्रेटा और वेन्यू जैसी पॉपुलर गाड़ियों को भारत से एक्सपोर्ट कर रही है। इसके अलावा, किआ इंडिया और फॉक्सवैगन जैसी कंपनियों ने भी एक्सपोर्ट के वॉल्यूम को बढ़ाने में बड़ा रोल प्ले किया है। टाटा मोटर्स और महिंद्रा भी अब धीरे-धीरे अपनी इलेक्ट्रिक और डीजल गाड़ियों के साथ विदेशी मार्केट में पैर पसार रहे हैं।
विदेशी बाजारों में भारतीय कारों का क्रेज क्यों?
सवाल यह उठता है कि अचानक कार एक्सपोर्ट में इतनी तेजी क्यों आई? इसके पीछे कई स्ट्रैटेजिक कारण हैं:
- क्वालिटी और सेफ्टी: पहले भारतीय कारों को ग्लोबल मार्केट में ‘लो-कॉस्ट’ के नजरिए से देखा जाता था, लेकिन अब ग्लोबल NCAP रेटिंग्स में भारतीय गाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन ने इस सोच को बदल दिया है।
- कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग: भारत में लेबर कॉस्ट और प्रोडक्शन एफिशिएंसी की वजह से कंपनियां कम दाम में बेहतर फीचर्स दे पा रही हैं।
- ग्लोबल सप्लाई चेन का शिफ्ट होना: चीन के विकल्प के रूप में दुनिया अब भारत की ओर देख रही है। कई ग्लोबल ब्रांड्स ने भारत को अपना एक्सपोर्ट हब बना लिया है।
भारत की इस तरक्की के बारे में अधिक जानने के लिए आप Automobile Industry in India का विकिपीडिया पेज देख सकते हैं, जहाँ सेक्टर की पूरी हिस्ट्री दी गई है।
टेबल: टॉप एक्सपोर्टर्स और उनकी परफॉरमेंस
| कंपनी का नाम | एक्सपोर्ट में ग्रोथ (%) | प्रमुख मॉडल्स |
|---|---|---|
| मारुति सुजुकी | 18% – 20% | Fronx, Baleno, Swift |
| हुंडई इंडिया | 15% | Creta, Verna, Venue |
| किआ इंडिया | 12% | Seltos, Sonet |
| निसान/रेनो | 10% | Magnite, Kiger |
सरकार की नीतियों का बड़ा हाथ
कार एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने में भारत सरकार की नीतियों ने ‘बूस्टर डोज’ का काम किया है। PLI (Production Linked Incentive) स्कीम के तहत ऑटो कंपनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग करने और उसे एक्सपोर्ट करने पर भारी इंसेंटिव्स मिल रहे हैं। इससे कंपनियों का मुनाफा बढ़ा है और वे अपनी गाड़ियों को इंटरनेशनल मार्केट में ज्यादा कॉम्पिटिटिव रेट्स पर बेच पा रही हैं।
इसके अलावा, भारत के पोर्ट्स और लॉजिस्टिक्स में हुआ सुधार भी एक बड़ी वजह है। अब फैक्ट्रियों से पोर्ट्स तक गाड़ियों को पहुँचाना पहले के मुकाबले तेज और आसान हो गया है। सरकार ने कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) पर भी काम शुरू किया है, जिससे आने वाले समय में एक्सपोर्ट ड्यूटी कम होगी और भारतीय गाड़ियों का दबदबा और बढ़ेगा।
इलेक्ट्रिक गाड़ियों (EVs) का भविष्य
सिर्फ पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि कार एक्सपोर्ट के मामले में अब इलेक्ट्रिक गाड़ियां भी अपनी जगह बना रही हैं। टाटा मोटर्स अपनी टियागो EV और नेक्सॉन EV के साथ पड़ोसी देशों और कुछ यूरोपियन मार्केट्स में एंट्री कर रही है। जैसे-जैसे दुनिया ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रही है, भारत के पास एक सुनहरा मौका है कि वह खुद को दुनिया का ‘EV मैन्युफैक्चरिंग हब’ बना ले।
चुनौतियां भी कम नहीं हैं
भले ही कार एक्सपोर्ट के आंकड़े 33% उछल गए हों, लेकिन आगे का रास्ता इतना आसान भी नहीं है। रेड सी क्राइसिस और ग्लोबल शिपिंग कंटेनर्स की कमी की वजह से लॉजिस्टिक कॉस्ट बढ़ रही है। साथ ही, कुछ इंटरनेशनल मार्केट्स में मंदी का साया भी है, जो डिमांड को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, भारतीय कंपनियों ने जिस तरह से अपनी स्ट्रैटेजी बदली है, उसे देखते हुए एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह ग्रोथ रेट आने वाले सालों में भी बरकरार रहेगी।
कार एक्सपोर्ट में इस बढ़त का सीधा फायदा देश की इकोनॉमी को हो रहा है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) भारत आ रही है, बल्कि देश में लाखों नए रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं। जब एक गाड़ी एक्सपोर्ट होती है, तो उसके साथ जुड़े टायर्स, कांच, प्लास्टिक और अन्य छोटे कंपोनेंट्स बनाने वाली हजारों MSMEs को भी काम मिलता है।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर देखा जाए तो कार एक्सपोर्ट में आई यह 33% की तेजी भारतीय ऑटो सेक्टर के लिए एक टर्निंग पॉइंट है। हम अब सिर्फ गाड़ियां कंज्यूम करने वाला देश नहीं रहे, बल्कि दुनिया को गाड़ियां सप्लाई करने वाले देश बन चुके हैं। मारुति, हुंडई और अन्य खिलाड़ियों ने जो शुरुआत की है, उसे अब नई स्टार्टअप्स और EV कंपनियां आगे बढ़ा रही हैं। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो वो दिन दूर नहीं जब दुनिया के हर कोने में ‘मेड इन इंडिया’ कार दौड़ती नजर आएगी।
भारत का ऑटो सेक्टर अब ग्लोबल बेंचमार्क सेट कर रहा है। कार एक्सपोर्ट की यह कहानी सिर्फ सेल्स की नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते आत्मविश्वास की भी है। ऑटोमोबाइल जगत की ऐसी ही और भी वायरल और इंफॉर्मेटिव खबरों के लिए हमारे साथ बने रहें।
