Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- मायावती के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले का विस्तृत विश्लेषण।
- बीजेपी (BJP) और सपा-कांग्रेस गठबंधन (I.N.D.I.A.) पर पड़ने वाला प्रभाव।
- बसपा (BSP) की ‘एकला चलो’ नीति के पीछे की असली पॉलिटिकल स्ट्रेटेजी।
- क्या मायावती फिर से 2007 वाला ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूला दोहरा पाएंगी?
- ग्राउंड रियलिटी: क्या दलित और मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी होगी?
मायावती दांव ने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में एक नया ‘बम’ फोड़ दिया है। जैसे ही बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती ने यह ऐलान किया कि उनकी पार्टी आने वाले चुनावों में किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगी और अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, वैसे ही राजनीतिक पंडितों ने अपने-अपने कैलकुलेशन शुरू कर दिए हैं। यह कोई साधारण घोषणा नहीं है, बल्कि एक ऐसा पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक है जो बीजेपी के ‘मिशन 80’ और समाजवादी पार्टी के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले, दोनों की नींद उड़ा सकता है।
मायावती दांव: आखिर अकेले क्यों लड़ना चाहती हैं ‘बहन जी’?
जब हम मायावती दांव की गहराई में जाते हैं, तो समझ आता है कि मायावती का पिछला अनुभव गठबंधन के मामले में बहुत कड़वा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाया था। उस समय बसपा को 10 सीटें मिली थीं, जबकि सपा को सिर्फ 5 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। मायावती का मानना है कि बसपा का ‘कोर वोट’ (Dalit Vote Bank) तो गठबंधन के साथी को ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन दूसरी पार्टियों का वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं हो पाता।
यही कारण है कि इस बार मायावती ने किसी भी बड़े अलायंस से दूरी बना ली है। उनका मानना है कि अकेले लड़कर वह अपनी पार्टी की ‘बार्गेनिंग पावर’ को बचा सकती हैं। अगर त्रिकोणीय मुकाबला (Triangular Contest) होता है, तो कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं। मायावती का यह रुख साफ करता है कि वह किसी की ‘जूनियर पार्टनर’ बनकर नहीं रहना चाहतीं।
बीजेपी (BJP) के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
बीजेपी के लिए मायावती दांव एक ‘डबल-एज्ड स्वॉर्ड’ यानी दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ, अगर बसपा मजबूती से लड़ती है, तो वह विपक्षी वोटों का बंटवारा करेगी, जिससे सीधे तौर पर बीजेपी को फायदा हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, अगर मायावती का दलित वोट बैंक (विशेषकर जाटव वोट) वापस उनकी तरफ लौटता है, तो बीजेपी ने जो दलितों के बीच अपनी पैठ बनाई थी, उसे भारी नुकसान हो सकता है।
बीजेपी पिछले कुछ चुनावों से ‘गैर-जाटव’ दलितों को अपने पाले में लाने में कामयाब रही है। लेकिन मायावती की सक्रियता इस ‘वोट बैंक’ को फिर से बसपा की तरफ खींच सकती है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती दांव हमेशा से अप्रत्याशित रहा है। आप अधिक जानकारी के लिए मायावती के राजनीतिक सफर के बारे में विकिपीडिया पर पढ़ सकते हैं।
सपा-कांग्रेस गठबंधन (I.N.D.I.A.) की बढ़ी टेंशन
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के लिए मायावती दांव सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। ‘इंडिया’ गठबंधन को उम्मीद थी कि अगर मायावती उनके साथ आ जाती हैं, तो यूपी में बीजेपी को हराना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर हो जाएगा। लेकिन अब जब बसपा अकेले मैदान में है, तो मुस्लिम वोटों के बंटवारे का खतरा बढ़ गया है। यूपी के कई जिलों जैसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम और दलित आबादी का कॉम्बिनेशन हार-जीत तय करता है। अगर मायावती ने वहां मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, तो सपा-कांग्रेस के वोट बैंक में बड़ी सेंध लग सकती है।
इसीलिए, अखिलेश यादव अक्सर बसपा को ‘बीजेपी की बी-टीम’ कहकर घेरते हैं। हालांकि, मायावती इन आरोपों को सिरे से खारिज करती रही हैं। उनका कहना है कि बसपा की अपनी विचारधारा है और वह किसी के इशारे पर काम नहीं करती।
चुनावी इतिहास और बसपा का प्रदर्शन: एक नजर
नीचे दी गई टेबल से समझिए कि पिछले कुछ चुनावों में बसपा का ग्राफ कैसा रहा है:
| चुनाव वर्ष | गठबंधन का स्वरूप | बसपा की सीटें | वोट शेयर (%) |
|---|---|---|---|
| 2014 (लोकसभा) | अकेले | 0 | 19.77% |
| 2017 (विधानसभा) | अकेले | 19 | 22.23% |
| 2019 (लोकसभा) | सपा के साथ | 10 | 19.42% |
| 2022 (विधानसभा) | अकेले | 01 | 12.88% |
इस डेटा से स्पष्ट है कि भले ही बसपा की सीटें कम हुई हों, लेकिन उनका वोट शेयर अभी भी एक निर्णायक भूमिका में है। यही मायावती दांव की असली ताकत है।
क्या मुस्लिम-दलित गठजोड़ फिर से काम करेगा?
मायावती इस बार ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के पुराने फॉर्मूले को नए अंदाज में पेश कर रही हैं। वह जानती हैं कि अगर दलित + मुस्लिम + ब्राह्मण का एक हिस्सा उनके साथ आ जाए, तो वह फिर से किंगमेकर की भूमिका में आ सकती हैं। पश्चिमी यूपी में मायावती ने काफी ग्राउंड वर्क किया है। वहां के किसान आंदोलनों और जातीय समीकरणों को देखते हुए बसपा ने कई रणनीतिक बदलाव किए हैं।
यूपी की राजनीति की हर बारीक खबर के लिए आप TimesNews360 पर विजिट कर सकते हैं, जहां हम हर सीट का डीप एनालिसिस पेश करते हैं।
मायावती दांव: विरोधियों के लिए ‘सस्पेंस’
पॉलिटिकल एनालिस्ट्स का मानना है कि मायावती ने चुप रहकर और अकेले लड़ने का फैसला लेकर विरोधियों को कन्फ्यूज कर दिया है। न तो बीजेपी यह समझ पा रही है कि मायावती किसका वोट काटेंगी, और न ही सपा-कांग्रेस को यह अंदाजा है कि वह कितनी सीटों पर मजबूती से लड़ेंगी। यह सस्पेंस ही मायावती दांव की सबसे बड़ी खासियत है।
मायावती ने हाल ही में अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित करके और फिर कुछ समय के लिए उन्हें जिम्मेदारियों से मुक्त करके भी यह संकेत दिया था कि वह पार्टी के कैडर को एकजुट करने के लिए खुद कमान संभाल रही हैं। बसपा का कैडर आज भी बहुत अनुशासित है और वह ‘बहन जी’ के एक इशारे पर अपनी वफादारी बदलने को तैयार रहता है।
ग्राउंड लेवल पर बसपा की तैयारी
पिछले कुछ महीनों में मायावती ने बड़ी रैलियां कम की हैं, लेकिन ‘गांव चलो’ अभियान के जरिए छोटे-छोटे कैडर कैंप लगाए हैं। बसपा का फोकस अब शोर-शराबे वाली राजनीति के बजाय साइलेंट वोटिंग (Silent Voting) पर है। मायावती दांव का मुख्य उद्देश्य अपने बेस वोट को यह समझाना है कि कांग्रेस या सपा के साथ जाने से दलितों के मुद्दों की पहचान खो जाती है।
सोशल मीडिया के इस दौर में भी बसपा का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो स्मार्टफोन से दूर है, लेकिन वह मायावती की विचारधारा से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस बार टिकट बंटवारे में भी मायावती दांव देखने को मिल रहा है, जहां उन्होंने जातीय समीकरणों को बहुत ही सटीक तरीके से बैठाया है।
निष्कर्ष: किंगमेकर या केवल वोट कटुआ?
अंत में सवाल यही उठता है कि क्या मायावती दांव उन्हें सत्ता के करीब ले जाएगा या फिर वह केवल अन्य दलों के लिए खेल बिगाड़ने वाली साबित होंगी? अगर बसपा 15-20% वोट शेयर हासिल करने में सफल रहती है, तो यह तय है कि यूपी का नतीजा किसी की उम्मीद के मुताबिक नहीं होगा। राजनीति में ‘एकला चलो’ का रास्ता कठिन जरूर है, लेकिन यह स्वाभिमान और पहचान की लड़ाई भी है।
उत्तर प्रदेश की जनता अब विकास, जाति और धर्म के जिस त्रिकोण में फंसी है, उसमें मायावती दांव ने एक नया डायमेंशन जोड़ दिया है। आने वाले समय में रैलियों की तपिश और उम्मीदवारों की लिस्ट यह साफ कर देगी कि ‘हाथी’ की चाल कितनी मजबूत है। बीजेपी और सपा को अब अपनी रणनीति को नए सिरे से री-डिजाइन करना होगा, क्योंकि मायावती को कम आंकना हमेशा से राजनीतिक दलों की एक बड़ी भूल साबित हुई है।
बसपा सुप्रीमो ने साफ कर दिया है कि वह किसी के आगे नहीं झुकेंगी। उनकी यह जिद और मायावती दांव उन्हें फिर से राजनीति के केंद्र में ले आया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या उत्तर प्रदेश की जनता मायावती के इस अकेलेपन को अपना समर्थन देती है या फिर ध्रुवीकरण की राजनीति में बसपा का यह दांव खाली चला जाता है।
