आयरन डोम (Iron Dome) का नाम आज पूरी दुनिया में एक ऐसी ढाल के रूप में लिया जाता है, जिसे भेदना नामुमकिन सा लगता है। जब भी मिडिल ईस्ट में रॉकेट बरसते हैं, तो आसमान में एक चमक होती है और दुश्मन का मंसूबा खाक में मिल जाता है। अब यही तकनीक और इससे जुड़ी एडवांस चर्चाएं भारत के गलियारों में तेज हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी दौरों और इजरायल के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारी के बीच यह खबर डिफेंस एक्सपर्ट्स के लिए किसी बड़े धमाके से कम नहीं है। भारत अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए ‘प्रोजेक्ट कुशा’ (Project Kusha) पर काम कर रहा है, जिसे भारत का अपना ‘आयरन डोम’ कहा जा रहा है।
Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- आयरन डोम की कार्यप्रणाली और इसकी अचूक क्षमता।
- भारत का ‘प्रोजेक्ट कुशा’ और इजरायली तकनीक का कनेक्शन।
- S-400 बनाम आयरन डोम: भारत की दोहरी सुरक्षा।
- चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर इस सिस्टम का प्रभाव।
- भविष्य की ‘आयरन बीम’ (Laser Tech) तकनीक पर एक नजर।
आयरन डोम क्या है और यह कैसे काम करता है?
आयरन डोम एक ऑल-वेदर, मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम है जिसे राफेल एडवांस्ड डिफेंस सिस्टम्स और एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) द्वारा विकसित किया गया है। इसका मुख्य काम कम दूरी के रॉकेट, मोर्टार और आर्टिलरी शेल्स को हवा में ही इंटरसेप्ट करके नष्ट करना है।
इस सिस्टम के तीन मुख्य हिस्से होते हैं:
- Detection & Tracking Radar: यह रडार दुश्मन की तरफ से आने वाले किसी भी खतरे को भांप लेता है।
- Battle Management & Weapon Control (BMC): यह सिस्टम का दिमाग है। यह तय करता है कि रॉकेट आबादी वाले इलाके में गिरेगा या खाली मैदान में। अगर खतरा बड़ा है, तभी यह मिसाइल दागने का आदेश देता है।
- Missile Firing Unit: यहाँ से ‘तामिर’ (Tamir) इंटरसेप्टर मिसाइलें निकलती हैं जो दुश्मन के रॉकेट को हवा में ही उड़ा देती हैं।
भारत के लिए आयरन डोम जैसी तकनीक इसलिए जरूरी है क्योंकि हमारे पड़ोसी देशों से लगातार ड्रोन और कम दूरी की मिसाइलों का खतरा बना रहता है। अधिक जानकारी के लिए आप TimesNews360 पर डिफेंस अपडेट्स देख सकते हैं।
प्रोजेक्ट कुशा: भारत का अपना स्वदेशी आयरन डोम
भारत ने हाल ही में अपने खुद के लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (LRSAM) सिस्टम पर काम तेज कर दिया है, जिसे ‘प्रोजेक्ट कुशा’ नाम दिया गया है। DRDO (Defence Research and Development Organisation) इस पर तेजी से काम कर रहा है। इसे भारतीय आयरन डोम कहा जा रहा है क्योंकि इसकी रेंज और मारक क्षमता इजरायली सिस्टम से भी कई गुना अधिक होने वाली है।
जहाँ इजरायल का सिस्टम 70 किमी तक की रेंज कवर करता है, वहीं भारत का प्रोजेक्ट कुशा 150 किमी से 350 किमी तक के खतरों को पहचान कर नष्ट करने की क्षमता रखेगा। इसमें इजरायल की रडार तकनीक और भारत की मिसाइल स्ट्रेंथ का एक अनोखा मेल देखने को मिलेगा। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह सिस्टम 2028-29 तक पूरी तरह तैयार हो सकता है। आप DRDO की आधिकारिक वेबसाइट drdo.gov.in पर इसके तकनीकी स्पेसिफिकेशन देख सकते हैं।
तुलना: आयरन डोम बनाम S-400 बनाम प्रोजेक्ट कुशा
भारत के पास पहले से ही रूस का S-400 मिसाइल सिस्टम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमें आयरन डोम की जरूरत है? नीचे दी गई टेबल से समझिए:
| फीचर | Iron Dome (इजरायल) | S-400 (रूस) | Project Kusha (भारत) |
|---|---|---|---|
| रेंज | 4 – 70 किमी | 400 किमी तक | 150 – 350 किमी |
| मुख्य उद्देश्य | रॉकेट, मोर्टार, ड्रोन | फाइटर जेट, बैलिस्टिक मिसाइल | क्रूज मिसाइल, ड्रोन, जेट |
| सफलता दर | 90% से अधिक | अत्यधिक उच्च | परीक्षण जारी |
इजरायल के साथ भारत की डिफेंस डील और पीएम मोदी का दौरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के बीच के संबंध जगजाहिर हैं। आयरन डोम तकनीक को लेकर भारत और इजरायल के बीच पहले भी कई स्तरों पर चर्चा हुई है। हालांकि, भारत ने कभी भी पूरा सिस्टम नहीं खरीदा, लेकिन इसकी मुख्य रडार तकनीक (ELM-2084) का इस्तेमाल भारत के कई डिफेंस सिस्टम्स में किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी के आगामी दौरे में ‘टेक्नोलॉजी ट्रांसफर’ (Transfer of Technology) पर बड़ी बात हो सकती है। इजरायल चाहता है कि भारत उसके ‘आयरन बीम’ (Iron Beam) प्रोजेक्ट में भी शामिल हो, जो कि एक लेजर-बेस्ड डिफेंस सिस्टम है। यह सिस्टम मिसाइलों की जगह लेजर का इस्तेमाल करता है, जिससे एक शॉट की लागत महज कुछ डॉलर रह जाती है।
दुश्मनों की टेंशन क्यों बढ़ी?
चीन और पाकिस्तान दोनों ही देशों ने हाल के वर्षों में ड्रोन स्वार्म (Drone Swarm) और शॉर्ट-रेंज मिसाइलों पर फोकस किया है। अगर भारत के पास आयरन डोम जैसी फुल-प्रूफ लेयर्ड सुरक्षा आ जाती है, तो उनके ये हथियार बेअसर हो जाएंगे।
1. LAC पर चीन की चुनौती: चीन ने एलएसी के पास कई रॉकेट रेजिमेंट तैनात की हैं। आयरन डोम या प्रोजेक्ट कुशा की तैनाती से भारत के अग्रिम सैन्य ठिकाने सुरक्षित हो जाएंगे।
2. पाकिस्तान का प्रोक्सी वॉर: पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमा पर ड्रोन के जरिए हथियार और ड्रग्स भेजने की घटनाओं को रोकने में यह तकनीक गेम-चेंजर साबित होगी।
Hinglish Context: क्यों है यह भारत के लिए ‘Game Changer’?
Boss, असली बात यह है कि आज के समय में युद्ध केवल टैंकों और सैनिकों से नहीं जीता जाता। आज का जमाना ‘Air Superiority’ का है। अगर आपका डिफेंस सिस्टम तगड़ा है, तो दुश्मन हमला करने से पहले सौ बार सोचेगा। आयरन डोम ने इजरायल को वह आत्मविश्वास दिया है कि वे किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं। भारत भी अब उसी राह पर चल पड़ा है। हम सिर्फ खरीदार नहीं बनना चाहते, बल्कि हम ‘Make in India’ के तहत खुद की ढाल बनाना चाहते हैं।
आयरन डोम की सीमाएं और भारत की रणनीति
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। आयरन डोम की अपनी सीमाएं भी हैं। यह सिस्टम संतृप्ति हमलों (Saturation Attacks) के दौरान संघर्ष कर सकता है—यानी अगर दुश्मन एक साथ हजारों रॉकेट दाग दे। इसीलिए भारत एक ‘Multi-Layered’ डिफेंस ग्रिड बना रहा है:
- Layer 1: S-400 (लंबी दूरी के लिए)
- Layer 2: Project Kusha / MRSAM (मध्यम दूरी के लिए)
- Layer 3: Akash & Iron Dome Tech (कम दूरी के लिए)
- Layer 4: VSHORADS (बहुत कम दूरी के खतरों के लिए)
इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था होने के बाद भारत का आसमान पूरी तरह से ‘नो-फ्लाई जोन’ बन जाएगा किसी भी दुश्मन मिसाइल के लिए।
निष्कर्ष: सुरक्षा का नया युग
आयरन डोम सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि इजरायल की इनोवेशन का प्रतीक है। भारत जिस तरह से इस तकनीक को अपना रहा है और उसे अपने स्वदेशी ‘प्रोजेक्ट कुशा’ में ढाल रहा है, वह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक बड़ा कदम है। आने वाले सालों में, भारतीय सीमाएं इतनी सुरक्षित होंगी कि दुश्मन की एक चिड़िया भी पर नहीं मार पाएगी। पीएम मोदी का इजरायल के साथ यह डिफेंस कोऑपरेशन न केवल सामरिक रूप से बल्कि तकनीकी रूप से भी भारत को सुपरपावर बनाने की दिशा में अहम है।
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