देसी AI

देसी AI और अमेरिकी टेक जाइंट्स की जंग: क्या भारत सिर्फ एक बड़ा मार्केट बनकर रह जाएगा?

  • Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
  • AI Impact Summit 2026 की मुख्य बातें और अमेरिकी कंपनियों का दबदबा।
  • भारतीय टेक इकोसिस्टम में ‘देसी AI’ की कमी के कारण।
  • GPU शॉर्टेज और डेटा डाइवर्सिटी की चुनौतियां।
  • क्या इंडिया का ‘Sovereign AI’ मिशन गेम चेंजर साबित होगा?
  • अमेरिकी दिग्गजों (OpenAI, Google) और भारतीय स्टार्टअप्स के बीच का बड़ा गैप।

देसी AI (Desi AI) आज ग्लोबल टेक्नोलॉजी की रेस में एक ऐसा शब्द बन चुका है, जिसे लेकर जितनी चर्चाएं हो रही हैं, उतनी ही चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं। दिल्ली में आयोजित ‘AI Impact Summit 2026’ में जो नज़ारा दिखा, उसने भारतीय टेक एक्सपर्ट्स के चेहरे पर शिकन ला दी है। इस समिट में दुनिया भर के दिग्गज जुटे थे, लेकिन चर्चा का केंद्र एक ही था—क्या अमेरिकी प्लेयर्स (OpenAI, Microsoft, Google, Meta) के सामने भारत का अपना कोई भी ऐसा चैलेंजर नहीं है जो उन्हें टक्कर दे सके? यह सवाल आज हर उस शख्स के मन में है जो भारत को एक ‘टेक्नोलॉजी सुपरपावर’ के रूप में देखना चाहता है।

AI Impact Summit 2026: एक कड़वी सच्चाई

इस समिट में पेश की गई रिपोर्ट्स के अनुसार, दुनिया के 90% से ज्यादा लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) फिलहाल अमेरिकी धरती पर तैयार हो रहे हैं। भारतीय कंपनियां जैसे कि Krutrim, Sarvam AI और Hanooman कोशिश तो कर रही हैं, लेकिन स्केल और कंप्यूट पावर के मामले में वे अभी भी सिलिकॉन वैली के दिग्गजों से कोसों दूर हैं। देसी AI के क्षेत्र में जो सबसे बड़ी कमी खल रही है, वह है ‘ओरिजिनल फाउंडेशन मॉडल्स’ की। हम आज भी अमेरिकी मॉडल्स को अपनी भाषाओं के हिसाब से फाइन-ट्यून कर रहे हैं, न कि अपना खुद का ग्राउंड-अप मॉडल खड़ा कर पा रहे हैं।

अमेरिकी मोनोपॉली और भारत का स्टेटस

जब हम देसी AI की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि AI की रेस सिर्फ कोड लिखने तक सीमित नहीं है। यह असल में ‘GPU War’ है। Nvidia जैसी कंपनियों के चिप्स पर आज अमेरिका का कब्जा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले OpenAI और Microsoft के पास जितने ‘H100’ चिप्स हैं, उतने शायद पूरे भारत के पास मिलाकर भी नहीं होंगे। ऐसे में यह कहना कि हमारे पास कोई चैलेंजर नहीं है, गलत नहीं होगा। समिट में मौजूद विशेषज्ञों का कहना था कि भारत के पास टैलेंट की कमी नहीं है, लेकिन जब बात अरबों डॉलर्स के इंफ्रास्ट्रक्चर की आती है, तो हम पिछड़ जाते हैं।

कंप्यूट पावर का संकट: क्यों पिछड़ रहा है भारत?

AI ट्रेनिंग के लिए जिस लेवल की कंप्यूटिंग पावर चाहिए, वह भारत में बहुत महंगी है। सरकार ने ‘IndiaAI Mission’ के तहत करीब 10,000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है, लेकिन क्या यह काफी है? देसी AI को बढ़ावा देने के लिए हमें सिर्फ सॉफ्टवेयर डेवलपर्स नहीं, बल्कि डेटा सेंटर्स और चिप मैन्युफैक्चरिंग की भी ज़रूरत है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास के लिए बिजली की खपत और कूलिंग सिस्टम भी एक बड़ा खर्च हैं, जिसके लिए हमारे स्टार्टअप्स के पास फिलहाल पर्याप्त फंडिंग नहीं है।

डेटा की डाइवर्सिटी: एक वरदान या अभिशाप?

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है, लेकिन देसी AI के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती भी है। हमारे पास 22 आधिकारिक भाषाएं और हजारों बोलियां हैं। ChatGPT जैसे टूल्स इंग्लिश में बेहतरीन काम करते हैं क्योंकि इंटरनेट पर 60% से ज्यादा डेटा इंग्लिश में है। लेकिन हिंदी, तमिल, बंगाली या मराठी में सटीक डेटा की कमी है। जब तक हम अपनी भाषाओं का एक विशाल ‘डिजिटल डेटासेट’ तैयार नहीं करते, तब तक हम विदेशी मॉडल्स पर ही निर्भर रहेंगे।

Table: अमेरिकी AI बनाम देसी AI (तुलनात्मक विश्लेषण)

CriteriaUS AI Giants (OpenAI, Google)Indian AI Startups (Desi AI)
फंडिंग (Funding)$100 Billion+Approx $500 Million – $1 Billion
कंप्यूट रिसोर्सेज (GPUs)लाखों में (H100, B200)हजारों में सीमित
डेटा एक्सेसग्लोबल इंटरनेट डेटाक्षेत्रीय भाषाओं की कमी
सरकार का सपोर्टप्राइवेट सेक्टर लीडरशिपसरकारी सब्सिडी पर निर्भरता

Sovereign AI: क्या यही है समाधान?

समिट में एक और महत्वपूर्ण टर्म ‘Sovereign AI’ गूंजा। इसका मतलब है कि भारत का अपना डेटा भारत के ही मॉडल्स द्वारा प्रोसेस होना चाहिए। अगर हम देसी AI को डेवलप नहीं करते, तो हमारी डिजिटल संप्रभुता (Digital Sovereignty) खतरे में पड़ सकती है। कल को अगर अमेरिकी कंपनियां अपनी सर्विसेज बंद कर दें या डेटा एक्सेस ब्लॉक कर दें, तो हमारा पूरा डिजिटल ढांचा चरमरा सकता है। इसलिए TimesNews360 के माध्यम से हम यह कहना चाहते हैं कि AI अब सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।

टैलेंट ड्रेन की समस्या

एक और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दुनिया की टॉप AI कंपनियों में काम करने वाले लगभग 20-30% इंजीनियर्स भारतीय मूल के हैं। लेकिन वे भारत के लिए देसी AI नहीं बना रहे, बल्कि सिलिकॉन वैली के लिए काम कर रहे हैं। भारत में उन्हें वह इकोसिस्टम, रिसर्च लैब और सैलरी पैकेज नहीं मिल पा रहा है जो उन्हें अमेरिका में मिलता है। समिट में यह सुझाव दिया गया कि जब तक भारत ‘रिसर्च ओरिएंटेड’ माहौल नहीं बनाएगा, तब तक हमारे टॉप ब्रेन्स बाहर ही जाते रहेंगे।

देसी AI का भविष्य: क्या 2030 तक कुछ बदलेगा?

भले ही आज तस्वीर थोड़ी धुंधली दिख रही हो, लेकिन उम्मीद की किरण अभी भी बाकी है। रिलायंस इंडस्ट्रीज (Jio) और टाटा ग्रुप जैसे बड़े घराने अब AI इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रहे हैं। Nvidia के साथ उनकी पार्टनरशिप भारत में GPU एक्सेस को बढ़ाएगी। देसी AI को सफल बनाने के लिए हमें ‘Vertical AI’ पर ध्यान देना होगा। यानी, हम शायद जनरल पर्पस ChatGPT न बना पाएं, लेकिन हम खेती, स्वास्थ्य सेवा (Healthcare) और गवर्नेंस के लिए ऐसे टूल्स बना सकते हैं जो पूरी दुनिया में कोई और नहीं बना सकता।

Conclusion: क्या हम हार मान चुके हैं?

नहीं, यह हार मानने का समय नहीं है, बल्कि जागने का समय है। AI Impact Summit 2026 ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिकी प्लेयर्स बहुत आगे निकल चुके हैं, लेकिन भारत के पास ‘डेटा’ और ‘डेमोग्राफी’ का एडवांटेज है। देसी AI के निर्माण के लिए हमें एक ‘कोलेबोरेटिव अप्रोच’ अपनानी होगी, जहाँ सरकार, प्राइवेट सेक्टर और एकेडेमिया मिलकर काम करें। अगर हम आज निवेश नहीं करते, तो हम सिर्फ एक ‘कंज्यूमर मार्केट’ बनकर रह जाएंगे, जबकि दुनिया ‘प्रोड्यूसर’ बनकर राज करेगी।

अंत में, देसी AI की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम अपनी स्थानीय समस्याओं को हल करने के लिए तकनीक का कितना बेहतर इस्तेमाल करते हैं। अमेरिका ने ग्लोबल मॉडल्स बनाए हैं, भारत को ‘लोकल एक्सपर्ट मॉडल्स’ बनाने चाहिए जो 1.4 बिलियन लोगों की ज़रूरतों को पूरा कर सकें।

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