Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- गलगोटिया विवाद का पूरा घटनाक्रम और बैकग्राउंड।
- सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने कैसे आग में घी डालने का काम किया।
- डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy) की कमी और वायरल वीडियो का सच।
- टेक्नोलॉजी के दौर में कैसे फेक न्यूज भारत की छवि को प्रभावित कर रही है।
- एक्सपर्ट की राय: क्या वाकई यह प्रोपेगेंडा था?
गलगोटिया विवाद आज के डिजिटल युग में एक ऐसी मिसाल बन गया है, जो यह दिखाता है कि कैसे अधूरी जानकारी और सोशल मीडिया की ताकत किसी भी संस्थान की छवि को मिनटों में बदल सकती है। जब हम टेक्नोलॉजी और सूचना के प्रवाह की बात करते हैं, तो अक्सर हम इसके सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देते हैं, लेकिन इस विवाद ने हमें इसके डार्क साइड (Dark Side) से रूबरू कराया है। पिछले कुछ दिनों से इंटरनेट पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्रों को एक विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ सवालों के जवाब देते हुए दिखाया गया। इस वीडियो के बाद पूरे इंटरनेट पर बहस छिड़ गई कि क्या भारत का एजुकेशन सिस्टम और वहां के छात्र केवल किताबी ज्ञान तक सीमित हैं?
गलगोटिया विवाद का बैकग्राउंड और वायरल वीडियो का सच
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया पर एक रिपोर्टर ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों से कुछ बुनियादी सवाल पूछे। वीडियो में दिखाया गया कि छात्र उन सवालों के जवाब देने में असमर्थ थे। देखते ही देखते, गलगोटिया विवाद ट्विटर (अब X), इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ट्रेंड करने लगा। लोग इसे ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘एजुकेशन सिस्टम’ की विफलता के रूप में देखने लगे। लेकिन क्या एक छोटा सा वीडियो क्लिप पूरी यूनिवर्सिटी या पूरे देश के छात्रों की योग्यता को परिभाषित कर सकता है?
टेक्नोलॉजी के नजरिए से देखें तो यहाँ ‘सेलेक्टिव एडिटिंग’ (Selective Editing) का एक बड़ा रोल नजर आता है। अक्सर वीडियो को इस तरह एडिट किया जाता है कि केवल वही हिस्सा बाहर आए जो किसी खास नैरेटिव को सूट करता हो। सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के इस दौर में, किसी भी खबर को वायरल करना बहुत आसान है, लेकिन उसके पीछे की सच्चाई को समझना उतना ही कठिन।
सोशल मीडिया एल्गोरिदम और प्रोपेगेंडा की मशीनरी
जब भी कोई संवेदनशील मुद्दा जैसे गलगोटिया विवाद सामने आता है, तो सोशल मीडिया के एल्गोरिदम उसे और अधिक बूस्ट (Boost) देते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नकारात्मकता और विवाद पर ‘Engagement’ ज्यादा मिलता है। लोग कमेंट्स करते हैं, शेयर करते हैं और बहस करते हैं। इससे प्लेटफॉर्म्स को फायदा होता है, लेकिन समाज में गलत संदेश जाता है। इस विवाद में भी यही हुआ। AI-आधारित एल्गोरिदम ने उन वीडियो को करोड़ों लोगों तक पहुँचाया, बिना यह जांचे कि उनका संदर्भ (Context) क्या है।
टाइम्सन्यूज360 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डिजिटल साक्षरता अभी भी उस स्तर पर नहीं पहुँची है जहाँ लोग ‘Deepfakes’ या ‘Manipulated Media’ को पहचान सकें। TimesNews360 हमेशा इस बात पर जोर देता है कि पाठकों को किसी भी खबर पर यकीन करने से पहले उसके सोर्स को जरूर चेक करना चाहिए।
टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल या दुरुपयोग?
गलगोटिया विवाद में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कैसे मोबाइल टेक्नोलॉजी और सस्ते इंटरनेट ने हर किसी को ‘पत्रकार’ बना दिया है। बिना किसी एथिक्स (Ethics) के वीडियो बनाना और उन्हें ऑनलाइन पोस्ट करना कई बार निर्दोष लोगों और संस्थानों के लिए घातक साबित होता है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने बाद में स्पष्ट किया कि उनके छात्र कई नेशनल और इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में जीत हासिल कर चुके हैं, लेकिन उन उपलब्धियों को वह ‘रीच’ (Reach) नहीं मिली जो उस एक विवादित वीडियो को मिली।
| पहलू | सोशल मीडिया का दावा | वास्तविक तथ्य (Reality Check) |
|---|---|---|
| छात्रों की योग्यता | छात्रों को बुनियादी जानकारी नहीं है। | वीडियो सेलेक्टिवली एडिटेड था, कई मेधावी छात्र भी वहां मौजूद थे। |
| संस्थान की छवि | यूनिवर्सिटी केवल राजनीति का केंद्र है। | यूनिवर्सिटी ने कई रिसर्च और टेक पेटेंट अपने नाम किए हैं। |
| इंटरनेट का रोल | सत्य का प्रसार करना। | एल्गोरिदम द्वारा विवादित कंटेंट को प्रमोट करना। |
भारत की वैश्विक छवि पर असर
अक्सर यह कहा जाता है कि गलगोटिया विवाद जैसे मामलों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बदनामी होती है। लेकिन सच तो यह है कि दुनिया अब जानती है कि भारत एक ‘IT Superpower’ है। सिलिकॉन वैली से लेकर लंदन तक भारतीय इंजीनियर्स और प्रोफेशनल्स का दबदबा है। एक यूनिवर्सिटी कैंपस के वीडियो से भारत की मेधा (Intellect) को नहीं मापा जा सकता। हालांकि, यह विवाद हमें यह चेतावनी जरूर देता है कि हमें अपनी डिजिटल बाउंड्रीज को सुरक्षित करना होगा।
डेटा साइंस और बिग डेटा के जानकारों का मानना है कि ऐसे विवाद अक्सर ‘बॉट नेटवर्क’ (Bot Networks) द्वारा हवा दिए जाते हैं। विदेशी ताकतें भी कई बार भारतीय संस्थानों को नीचा दिखाने के लिए ऐसी टेक्नोलॉजी का सहारा लेती हैं। इसलिए, गलगोटिया विवाद केवल एक लोकल इश्यू नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल ‘इंफॉर्मेशन वॉरफेयर’ (Information Warfare) का एक छोटा सा हिस्सा है।
कैसे बचें फेक न्यूज और ऑनलाइन विवादों से?
गलगोटिया विवाद से हमें जो सबसे बड़ी सीख मिलती है, वह है ‘Fact-Checking’ की आदत डालना। आज के समय में ऐसी कई AI वेबसाइट्स और टूल्स मौजूद हैं जो आपको बता सकते हैं कि वीडियो एडिटेड है या नहीं। इसके अलावा, गूगल रिवर्स इमेज सर्च और मेटाडेटा एनालिसिस जैसे टूल्स भी काफी मददगार साबित होते हैं।
एडटेक (EdTech) और डिजिटल लर्निंग का भविष्य
इस विवाद के बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का एडटेक सेक्टर दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रहा है। गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान भी अब अपनी टीचिंग मेथोडोलॉजी में टेक्नोलॉजी को शामिल कर रहे हैं। इस विवाद के बाद, यूनिवर्सिटी ने अपने कम्युनिकेशन और पब्लिक रिलेशन्स (PR) को सुधारने के लिए डिजिटल टूल्स का सहारा लेना शुरू किया है। यह दिखाता है कि टेक्नोलॉजी न केवल विवाद पैदा कर सकती है, बल्कि उसे सुलझाने और डैमेज कंट्रोल (Damage Control) करने में भी सहायक है।
गलगोटिया विवाद के दौरान यह भी देखा गया कि कैसे इंटरनेट पर दो धड़े बन गए। एक धड़ा छात्रों का मजाक उड़ा रहा था, तो दूसरा धड़ा इसे सोची-समझी साजिश बता रहा था। इस तरह का ‘Polarization’ सोशल मीडिया की देन है। जब हम किसी चीज को बार-बार देखते हैं, तो हमारा दिमाग उसे ही सच मानने लगता है। इसे ‘Echo Chamber’ इफेक्ट कहते हैं। इस इफेक्ट को खत्म करने के लिए हमें अलग-अलग सोर्सेज से खबरें पढ़नी चाहिए।
निष्कर्ष: असली सच क्या है?
अंत में, गलगोटिया विवाद का असली सच यह है कि यह मामला छात्रों की जानकारी से ज्यादा सोशल मीडिया के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और वायरल होने की होड़ का नतीजा था। भारत की छवि इतनी कमजोर नहीं है कि वह एक वीडियो से धूमिल हो जाए, लेकिन हमें यह समझना होगा कि भविष्य ‘साइबर-फिजिकल’ है। हमें न केवल सड़कों पर बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी अपने संस्थानों और अपनी छवि की रक्षा करनी होगी।
टेक्नोलॉजी हमें सशक्त बनाने के लिए है, न कि हमें नीचा दिखाने के लिए। गलगोटिया विवाद हमें याद दिलाता है कि कंटेंट ‘किंग’ हो सकता है, लेकिन ‘कंटेक्स्ट’ (Context) उसका भगवान है। बिना संदर्भ के कोई भी जानकारी केवल शोर है। इसलिए, अगली बार जब आप कोई ऐसा वीडियो देखें, तो उसे शेयर करने से पहले एक बार जरूर सोचें कि क्या आप किसी बड़े प्रोपेगेंडा का हिस्सा तो नहीं बन रहे?
भारत के एजुकेशन सिस्टम में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है, लेकिन उसे नीचा दिखाने के लिए टेक्नोलॉजी का गलत इस्तेमाल करना कतई जायज नहीं है। गलगोटिया विवाद ने हमें आईना दिखाया है कि हमें डिजिटल वर्ल्ड में और अधिक मैच्योर होने की जरूरत है। टाइम्सन्यूज360 आपको हमेशा ऐसी ही गहराई भरी रिपोर्ट्स देता रहेगा ताकि आप सच और झूठ के बीच का फर्क समझ सकें।
याद रखिए, गलगोटिया विवाद केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक सबक है। एक सबक यह सीखने का कि कैसे हम अपनी डिजिटल आजादी का सही इस्तेमाल करें और कैसे भारत को ग्लोबल टेक लीडर बनाने में अपना योगदान दें, न कि फेक न्यूज फैलाकर उसकी छवि खराब करें।
