नई दिल्ली, 1 नवंबर 2026: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक टकराव अब संसद से निकलकर सार्वजनिक मंच तक पहुंच गया है। INDIA गठबंधन के नेताओं ने 31 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सरकारी आवास पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एक प्रतीकात्मक ‘पब्लिक इम्पीचमेंट’ कार्यक्रम आयोजित किया। इस दौरान विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों और चुनावी पारदर्शिता को लेकर कई सवाल उठाए।
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में विपक्षी दलों के नेताओं ने एक प्रतीकात्मक संसदीय कार्यवाही की। इस दौरान ज्ञानेश कुमार पर कई गंभीर आरोप लगाए गए और उनके खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इस कार्यक्रम का कोई संवैधानिक या कानूनी प्रभाव नहीं है। यह विपक्ष की ओर से राजनीतिक विरोध दर्ज कराने और जनता के बीच अपना पक्ष रखने की एक पहल थी।
खड़गे के आवास पर कैसे हुई ‘पब्लिक इम्पीचमेंट’ की कार्यवाही?
INDIA गठबंधन ने इस कार्यक्रम को सामान्य राजनीतिक बैठक के बजाय संसद की कार्यवाही की तर्ज पर आयोजित किया। इसमें पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अध्यक्षता की, जबकि मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया।
कार्यक्रम के दौरान खड़गे ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं और संस्था को राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के प्रभाव में चुनाव आयोग के काम करने का आरोप भी लगाया।
विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ छह प्रमुख आरोपों को सामने रखा। उनका कहना था कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के कारण आम मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
कार्यक्रम के अंत में विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग से जुड़ा प्रस्ताव पारित किया। हालांकि, ये सभी आरोप विपक्ष के राजनीतिक दावे हैं और इन्हें किसी न्यायिक फैसले से साबित तथ्य नहीं माना जा सकता।
अशोका होटल से खड़गे के आवास तक क्यों पहुंचा कार्यक्रम?
विपक्ष ने शुरुआत में इस प्रतीकात्मक कार्यवाही को अशोका होटल के लॉन में आयोजित करने की योजना बनाई थी। इसके लिए मॉक पार्लियामेंट यानी नकली संसदीय सत्र का प्रारूप तैयार किया गया था।
लेकिन कार्यक्रम के लिए निर्धारित स्थान पर अनुमति नहीं मिलने के बाद आयोजन की जगह बदलनी पड़ी। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें अन्य स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई।
इसके बाद 10 राजाजी मार्ग स्थित मल्लिकार्जुन खड़गे के सरकारी आवास को कार्यक्रम का नया स्थल बनाया गया।
कार्यक्रम मूल रूप से 30 अक्टूबर को आयोजित होना था, लेकिन दिल्ली में बारिश के कारण इसे एक दिन आगे बढ़ाकर 31 अक्टूबर कर दिया गया। इसके बाद विपक्षी नेताओं ने तय कार्यक्रम के अनुसार प्रतीकात्मक कार्यवाही पूरी की।
SIR विवाद क्या है और विपक्ष चुनाव आयोग पर क्यों उठा रहा सवाल?
इस पूरे राजनीतिक विवाद की जड़ मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) है।
चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूचियों को अपडेट और सत्यापित करने के लिए यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना और पात्र मतदाताओं का विवरण सही रखना है।
हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि SIR प्रक्रिया के दौरान कई जगह वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए और कुछ पात्र नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित होने का खतरा पैदा हुआ।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेताओं ने इस मुद्दे को ‘वोट चोरी’ का नाम दिया है। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है और मतदाता सूची में किसी भी तरह की गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। https://timesnews360.com/india-gathbandhan-maharally-delhi-2026/
दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से चुनावी प्रक्रियाओं का बचाव किया गया है। ऐसे में SIR को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लगातार जारी है।
संसद में CEC को हटाने का प्रस्ताव क्यों नहीं हो पाया स्वीकार?
मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग विपक्ष पहले भी संसद में उठा चुका है।
साल 2026 में विपक्षी सांसदों ने दोनों सदनों में ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए नोटिस दिया था। इन नोटिसों में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और कथित चुनावी अनियमितताओं को लेकर कई आरोप लगाए गए थे।
हालांकि, 6 अप्रैल 2026 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने इन नोटिसों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
इसके बाद विपक्ष ने संसदीय प्रक्रिया के बाहर इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने का फैसला किया। इसी रणनीति के तहत ‘पब्लिक इम्पीचमेंट’ कार्यक्रम आयोजित किया गया।
विपक्ष का कहना है कि संसद में उसके प्रस्तावों को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला, इसलिए अब वह जनता के सामने अपना पक्ष रख रहा है।
क्या जनता की अदालत में CEC को हटाया जा सकता है? जानिए संविधान का नियम
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह सार्वजनिक रूप से महाभियोग चलाया जा सकता है?
इसका जवाब है- नहीं। खड़गे के आवास पर आयोजित कार्यक्रम केवल प्रतीकात्मक था। भारतीय संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए निर्धारित एक अलग संवैधानिक प्रक्रिया है।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
इसके लिए दो प्रमुख आधार हैं:
- सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour)
- अक्षमता (Incapacity)
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में निर्धारित विशेष बहुमत से पारित करना जरूरी होता है। इसके लिए प्रत्येक सदन में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन आवश्यक है।
प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं।
इसलिए खड़गे के आवास पर आयोजित प्रतीकात्मक कार्यवाही से ज्ञानेश कुमार का पद समाप्त नहीं होता और न ही इसके आधार पर उन्हें कानूनी रूप से हटाया जा सकता है।
विपक्ष के सामने अब आगे की क्या चुनौती है?
INDIA गठबंधन के इस कार्यक्रम के बाद अब राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित महारैली है।
विपक्ष ने ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ के नारे के साथ इस रैली का आयोजन किया है। गठबंधन का उद्देश्य SIR प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से जुड़े मुद्दों को बड़े स्तर पर उठाना है।
राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेता पहले ही संकेत दे चुके हैं कि यह आंदोलन केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होगा। गठबंधन की ओर से नवंबर में भी दिल्ली मार्च की आगे की योजना बनाई गई है।
अब देखना होगा कि विपक्ष का यह अभियान चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे पर कितना जनसमर्थन जुटा पाता है और चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोपों को लेकर आगे क्या राजनीतिक और संवैधानिक घटनाक्रम सामने आते हैं।
निष्कर्ष: ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन का ‘पब्लिक इम्पीचमेंट’ कार्यक्रम कानूनी महाभियोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और प्रतीकात्मक विरोध था। इस आयोजन के जरिए विपक्ष ने चुनाव आयोग की जवाबदेही और मतदाताओं के अधिकारों का मुद्दा जनता के सामने रखा है। आने वाले दिनों में यह विवाद भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना रह सकता है।




