Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- मोहन सेतु परियोजना के काम में देरी की असल वजह।
- पूर्णेंदु तिवारी के ‘क्रेडिट वॉर’ वाले बयान का विश्लेषण।
- बरहज-सोनूघाट फोरलेन प्रोजेक्ट का लेटेस्ट स्टेटस।
- सरयू नदी पर बन रहे इस पुल का स्थानीय व्यापार पर असर।
- जनता की मांग और सरकार की डेडलाइन के बीच का अंतर।
मोहन सेतु परियोजना आज देवरिया और बरहज की राजनीति का सबसे हॉट टॉपिक बन चुकी है। बरहज-सोनूघाट फोरलेन मार्ग और सरयू नदी पर बन रहे इस पुल को लेकर लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन हाल ही में आए राजनीतिक बयानों ने इस मामले को पूरी तरह से गरमा दिया है। टाइम्सन्यूज360 की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रोजेक्ट को लेकर अब क्रेडिट लेने की होड़ मची हुई है। स्थानीय नेता पूर्णेंदु तिवारी ने इस मुद्दे पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि जनता सब देख रही है कि काम किसने शुरू करवाया और कौन अब इसके पूरे होने का श्रेय लेने के लिए लाइन में खड़ा है।
मोहन सेतु: विकास और राजनीति का संगम
जब हम विकास की बात करते हैं, तो इंफ्रास्ट्रक्चर सबसे ऊपर आता है। लेकिन मोहन सेतु के मामले में विकास से ज्यादा राजनीति की गूँज सुनाई दे रही है। यह सेतु सिर्फ कंक्रीट का एक ढांचा नहीं है, बल्कि यह बरहज क्षेत्र को सीधे सोनूघाट और देवरिया मुख्यालय से जोड़ने वाली एक लाइफलाइन है। पूर्णेंदु तिवारी का कहना है कि प्रोजेक्ट में देरी होना एक गंभीर चिंता का विषय है, लेकिन उससे भी ज्यादा दुखद यह है कि कुछ लोग विकास कार्यों को केवल अपनी चुनावी जीत का जरिया बनाना चाहते हैं।
बरहज-सोनूघाट फोरलेन प्रोजेक्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने साफ किया कि जनता को गुमराह करना बंद होना चाहिए। इस प्रोजेक्ट के बजट आवंटन से लेकर जमीन अधिग्रहण तक की प्रक्रिया में कई बाधाएं आईं, जिन्हें स्थानीय संघर्ष के दम पर दूर किया गया। अब जबकि काम अंतिम चरणों में पहुंचने वाला है, तो श्रेय लेने की होड़ मच गई है।
प्रोजेक्ट की टाइमलाइन और मौजूदा स्थिति
मोहन सेतु परियोजना का लक्ष्य सरयू नदी के दो किनारों को जोड़कर यात्रा के समय को 45 मिनट तक कम करना है। वर्तमान में, लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। टाइम्सन्यूज360 ने जब प्रोजेक्ट साइट का दौरा किया, तो पाया कि पिलर का काम काफी हद तक पूरा हो चुका है, लेकिन कनेक्टिंग रोड और फोरलेन के चौड़ीकरण में अभी भी पेंच फंसे हुए हैं।
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| परियोजना का नाम | मोहन सिंह सेतु (बरहज) |
| मुख्य मार्ग | बरहज-सोनूघाट फोरलेन |
| नदी | सरयू (घाघरा) |
| अनुमानित लागत | करोड़ों में (संशोधित बजट) |
| लाभार्थी क्षेत्र | देवरिया, बरहज, और पूर्वांचल के जिले |
पूर्णेंदु तिवारी का कड़ा रुख और क्रेडिट वॉर
राजनीति में अक्सर देखा गया है कि जो प्रोजेक्ट पूरा होने की कगार पर होता है, उसे लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग छिड़ जाती है। मोहन सेतु के मामले में भी यही हो रहा है। पूर्णेंदु तिवारी ने दैनिक भास्कर और अन्य मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से यह संदेश दिया है कि इस पुल का सपना बरहज की जनता ने सालों पहले देखा था। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ नेता केवल फोटो खिंचवाने के लिए प्रोजेक्ट साइट पर आते हैं, जबकि जमीन पर काम की गति धीमी है।
उन्होंने यह भी कहा कि क्रेडिट लेने की होड़ में असली मुद्दा पीछे छूट जाता है। असली मुद्दा है—’समय सीमा’। अगर मोहन सेतु समय पर पूरा नहीं होता, तो इसकी बढ़ती लागत का बोझ अंततः जनता की जेब पर ही पड़ता है। उत्तर प्रदेश सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पूर्वांचल में ऐसे कई ब्रिज प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दी जा रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मॉनिटरिंग की कमी एक बड़ी चुनौती है।
स्थानीय व्यापार और कनेक्टिविटी पर असर
मोहन सेतु के निर्माण से केवल आवाजाही आसान नहीं होगी, बल्कि बरहज का आर्थिक परिदृश्य भी बदल जाएगा। बरहज एक ऐतिहासिक व्यापारिक केंद्र रहा है। इस फोरलेन के बनने से माल ढुलाई आसान हो जाएगी और गोरखपुर से लेकर बिहार बॉर्डर तक की कनेक्टिविटी सुधर जाएगी। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि इस सेतु के कारण उनकी ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट में 20% तक की कमी आ सकती है।
लेकिन सवाल वही है—कब? बार-बार बदलती डेडलाइन ने जनता के भरोसे को कम किया है। राजनीति की इस बिसात पर मोहन सेतु एक ऐसा मोहरा बन गया है जिसे हर दल अपने पाले में करना चाहता है। TimesNews360 की टीम ने जब स्थानीय लोगों से बात की, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि फीता कौन काटता है, उन्हें बस पुल चालू चाहिए।
चुनौतियां और प्रशासनिक ढिलाई
किसी भी बड़े प्रोजेक्ट में तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियां होती हैं। मोहन सेतु के निर्माण में सरयू नदी का जलस्तर और बरसात के मौसम में काम का रुकना एक प्राकृतिक चुनौती है। हालांकि, पूर्णेंदु तिवारी का तर्क है कि प्रशासनिक ढिलाई के कारण टेंडरिंग और फंड रिलीज में जो देरी हुई, वह मानव निर्मित थी। अगर सरकार और प्रशासन वाकई गंभीर होते, तो अब तक यह फोरलेन जनता के लिए खुल चुका होता।
उन्होंने चेतावनी दी कि अगर आने वाले महीनों में काम में तेजी नहीं आई, तो वह जनता के साथ मिलकर बड़ा आंदोलन करेंगे। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन जनहित को ताक पर नहीं रखा जा सकता। इस क्रेडिट वॉर में विकास की बलि नहीं चढ़नी चाहिए।
निष्कर्ष: क्या बदलेगी बरहज की तस्वीर?
मोहन सेतु का भविष्य अब सरकार की इच्छाशक्ति और स्थानीय नेताओं के दबाव पर निर्भर करता है। बरहज-सोनूघाट फोरलेन का पूरा होना क्षेत्र के विकास के लिए अनिवार्य है। पूर्णेंदु तिवारी के बयानों ने प्रशासन की नींद तो उड़ा दी है, लेकिन इसका परिणाम धरातल पर दिखना अभी बाकी है।
अंत में, मोहन सेतु केवल ईंट और पत्थर का पुल नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के हजारों युवाओं के रोजगार और किसानों की पहुंच का रास्ता है। राजनीति के इस शोर में अगर काम की गति बढ़ती है, तो इसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन अगर यह सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहा, तो जनता आने वाले चुनाव में इसका जवाब जरूर देगी। टाइम्सन्यूज360 इस मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए रखेगा ताकि सच जनता के सामने आता रहे।
मोहन सेतु से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट के लिए बने रहें हमारे साथ। विकास की इस दौड़ में क्रेडिट से ज्यादा ‘काम’ की कीमत है, और बरहज की जनता अब केवल रिजल्ट चाहती है।
