Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- मोजतबा खामेनई के अचानक चर्चा में आने की असली वजह।
- ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनई की गिरती सेहत और उत्तराधिकार की जंग।
- ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के साथ मोजतबा के गुप्त संबंध।
- क्या ईरान में अब ‘धार्मिक राजशाही’ की शुरुआत होने वाली है?
- भारत और मिडिल ईस्ट पर इस संभावित बदलाव का क्या असर पड़ेगा।
मोजतबा खामेनई आज न केवल ईरान बल्कि पूरी दुनिया की खुफिया एजेंसियों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए एक पहेली बने हुए हैं। ईरान, जो लंबे समय से पश्चिम के साथ अपने तनावपूर्ण संबंधों और घरेलू विरोध प्रदर्शनों के बीच झूल रहा है, अब एक बहुत बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। जब से ईरान के वर्तमान सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनई के बीमार होने की खबरें अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई हैं, तब से एक ही नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में है—मोजतबा खामेनई।
कौन हैं मोजतबा खामेनई?
मोजतबा खामेनई अली खामेनई के दूसरे बेटे हैं। वो पिछले कई दशकों से लाइमलाइट से दूर रहे हैं, लेकिन उनकी ‘लो प्रोफाइल’ छवि उनके कमजोर होने का संकेत नहीं है। असल में, तेहरान के गलियारों में यह बात जगजाहिर है कि मोजतबा पर्दे के पीछे से ईरान की सत्ता को कंट्रोल करते हैं। उनका जन्म 1969 में मशहद में हुआ था और उन्होंने धर्मशास्त्र की पढ़ाई की है, जो ईरान में सत्ता के शिखर तक पहुँचने के लिए एक अनिवार्य योग्यता मानी जाती है।
लेकिन मोजतबा खामेनई का असली पावर बेस उनकी धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि ईरान की सबसे ताकतवर सेना—इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा का IRGC के आला अधिकारियों के साथ बहुत गहरा तालमेल है। यही वो फैक्टर है जो उन्हें उत्तराधिकार की रेस में सबसे आगे खड़ा करता है।
सत्ता का संघर्ष और इब्राहिम रईसी की मौत
कुछ समय पहले तक, ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को अली खामेनई का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था। लेकिन एक हेलीकॉप्टर क्रैश में रईसी की मौत ने पूरी स्क्रिप्ट बदल दी। रईसी की मौत के बाद अब मोजतबा खामेनई के सामने कोई बड़ा प्रतिद्वंद्वी नजर नहीं आ रहा है। हालांकि, ईरान के संविधान के अनुसार, ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ अगले सुप्रीम लीडर का चुनाव करती है, लेकिन हकीकत यह है कि चुनाव प्रक्रिया पर अली खामेनई और उनके वफादारों का पूरा कंट्रोल है।
क्या यह ईरान में राजशाही की वापसी है?
ईरान के भीतर और बाहर कई लोग इस बात की आलोचना कर रहे हैं कि अगर मोजतबा खामेनई को सुप्रीम लीडर बनाया जाता है, तो यह 1979 की इस्लामी क्रांति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। क्रांति का मकसद ही शाह की राजशाही को खत्म करना था। अगर सत्ता पिता से बेटे के पास जाती है, तो यह फिर से एक तरह की राजशाही ही कहलाएगी। विरोधियों का कहना है कि यह ‘रिपब्लिक’ के नाम पर ‘डायनेस्टी’ चलाने जैसा है।
ताजा अपडेट्स और गहन विश्लेषण के लिए TimesNews360 पर अपनी नजर बनाए रखें।
ईरान की सत्ता के मुख्य दावेदार: एक तुलना
| दावेदार | ताकत (Pros) | कमजोरी (Cons) |
|---|---|---|
| मोजतबा खामेनई | IRGC का समर्थन, पिता का आशीर्वाद | जनता के बीच कम पहचान, राजशाही का टैग |
| अलिरेज़ा अराफी | धार्मिक विद्वान, असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सदस्य | राजनीतिक और सैन्य अनुभव की कमी |
| हसन रूहानी (पूर्व राष्ट्रपति) | उदारवादी चेहरा, प्रशासनिक अनुभव | कट्टरपंथियों का भारी विरोध |
मोजतबा खामेनई और अंतरराष्ट्रीय राजनीति
पूरी दुनिया, खासकर अमेरिका और इजरायल, मोजतबा खामेनई के हर कदम पर नजर रखे हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा अपने पिता से भी ज्यादा कट्टरपंथी विचारधारा रख सकते हैं। अगर वो सत्ता संभालते हैं, तो ईरान की फॉरेन पॉलिसी और भी आक्रामक हो सकती है। हमास, हिजबुल्लाह और हूतियों के साथ ईरान के संबंधों में और मजबूती आने की संभावना है।
पश्चिमी मीडिया रिपोर्ट्स, जैसे कि Reuters के अनुसार, ईरान के भीतर एक गुपचुप तरीके से ‘सक्सेशन प्लान’ तैयार किया गया है ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति में सत्ता का हस्तांतरण बिना किसी शोर-शराबे के हो सके। इसमें मोजतबा खामेनई का नाम सबसे ऊपर रखा गया है।
घरेलू चुनौतियां और जनता का गुस्सा
ईरान की जनता फिलहाल महंगाई, बेरोजगारी और सख्त सामाजिक पाबंदियों से परेशान है। ‘महिला, जीवन, स्वतंत्रता’ जैसे आंदोलनों ने पहले ही ईरान की जड़ों को हिला दिया है। ऐसी स्थिति में मोजतबा खामेनई के लिए सत्ता संभालना कांटों भरी राह हो सकती है। अगर वो सत्ता में आते हैं, तो उन्हें न केवल अपनी वैधता साबित करनी होगी, बल्कि गिरती हुई अर्थव्यवस्था को भी संभालना होगा।
मोजतबा खामेनई के पास प्रशासनिक अनुभव की कमी है। उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा और न ही किसी बड़े सार्वजनिक पद पर रहे हैं। उनकी पूरी ताकत उनकी ‘ब्लडलाइन’ और ‘बैकडोर नेगोशिएशन’ पर टिकी है। क्या ईरान की युवा पीढ़ी एक और खामेनई को स्वीकार करेगी? यह एक बड़ा सवाल है।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
भारत के लिए ईरान एक रणनीतिक पार्टनर है। चाबहार पोर्ट से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक, भारत के हित ईरान से जुड़े हैं। मोजतबा खामेनई अगर सुप्रीम लीडर बनते हैं, तो भारत को अपनी कूटनीति में नए सिरे से संतुलन बनाना होगा। ईरान की कट्टरपंथी नीतियों का असर पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता पर पड़ेगा, जिसका सीधा प्रभाव भारत के व्यापार और प्रवासी भारतीयों पर हो सकता है।
निष्कर्ष: भविष्य की धुंधली तस्वीर
अंत में, मोजतबा खामेनई का उदय ईरान के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वो अपने पिता की विरासत को सुरक्षित रख पाएंगे या फिर उनका नेतृत्व ईरान में एक नई क्रांति या उथल-पुथल की शुरुआत करेगा। फिलहाल, तेहरान से आ रही खबरें इशारा कर रही हैं कि ‘मोजतबा युग’ की तैयारी पूरी हो चुकी है, बस आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।
देश-दुनिया की तमाम बड़ी खबरों के लिए मोजतबा खामेनई जैसे संवेदनशील विषयों पर हमारी विस्तृत रिपोर्ट्स पढ़ते रहें।
