स्टार्टअप फंडिंग

स्टार्टअप फंडिंग: Equity दें या Royalty? जानिए आपके बिजनेस के लिए क्या है बेस्ट डील

स्टार्टअप फंडिंग आज के दौर में किसी भी नए बिजनेस की ग्रोथ के लिए ऑक्सीजन की तरह काम करती है। जब एक एंटरप्रेन्योर अपने आईडिया को एक बड़े ब्रांड में बदलने का सपना देखता है, तो उसे सबसे पहले पूंजी यानी कैपिटल की जरूरत होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप किसी इन्वेस्टर के पास जाते हैं, तो वह आपसे बदले में क्या मांगता है? आमतौर पर दो रास्ते होते हैं: पहला ‘इक्विटी’ (Equity) और दूसरा ‘रॉयल्टी’ (Royalty)। अक्सर शार्क टैंक इंडिया जैसे शो देखने के बाद लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर कौन सी डील बेहतर है? आज TimesNews360 के इस खास लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि आपको अपने स्टार्टअप के लिए क्या चुनना चाहिए।

  • Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
  • इक्विटी और रॉयल्टी के बीच का मुख्य अंतर।
  • स्टार्टअप फंडिंग के लिए इक्विटी देने के फायदे और नुकसान।
  • रॉयल्टी डील कैसे आपके कैश फ्लो को प्रभावित करती है।
  • इन्वेस्टर्स की पहली पसंद क्या होती है?
  • आपके बिजनेस मॉडल के हिसाब से कौन सी डील है बेस्ट।

इक्विटी फंडिंग क्या है? (Understanding Equity)

जब आप स्टार्टअप फंडिंग जुटाने के लिए अपनी कंपनी की हिस्सेदारी यानी ओनरशिप का एक छोटा हिस्सा किसी इन्वेस्टर को बेचते हैं, तो उसे इक्विटी फंडिंग कहा जाता है। उदाहरण के लिए, अगर आपकी कंपनी की वैल्यू 10 करोड़ रुपये है और कोई इन्वेस्टर 1 करोड़ रुपये लगाता है, तो वह बदले में 10% इक्विटी की मांग कर सकता है।

इक्विटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको यह पैसा वापस नहीं लौटाना पड़ता। अगर स्टार्टअप डूब जाता है, तो इन्वेस्टर का पैसा भी डूब जाता है, फाउंडर पर कोई कर्ज नहीं रहता। लेकिन, इसका एक बड़ा नुकसान यह है कि आप अपनी कंपनी का मालिकाना हक खोते जाते हैं। जैसे-जैसे आप ज्यादा राउंड की फंडिंग उठाएंगे, आपकी खुद की हिस्सेदारी कम होती जाएगी, जिसे बिजनेस की भाषा में ‘इक्विटी डाइल्यूशन’ कहते हैं।

इक्विटी डील के फायदे

1. नो रीपेमेंट प्रेशर: आपको हर महीने या हर साल इन्वेस्टर को पैसे वापस करने की टेंशन नहीं होती। आप पूरा ध्यान बिजनेस बढ़ाने पर लगा सकते हैं।
2. एक्सपर्ट गाइडेंस: इक्विटी इन्वेस्टर सिर्फ पैसा नहीं लगाता, वह कंपनी का पार्टनर बन जाता है। वह अपना नेटवर्क, अनुभव और सलाह भी साथ लाता है ताकि कंपनी ग्रो करे और उसकी हिस्सेदारी की वैल्यू बढ़े।
3. लॉन्ग टर्म विजन: इक्विटी होल्डर्स लंबी अवधि के फायदे के लिए निवेश करते हैं। उन्हें पता है कि प्रॉफिट आने में 5-7 साल लग सकते हैं।

रॉयल्टी डील क्या होती है? (What is Royalty Deal?)

रॉयल्टी का कॉन्सेप्ट इक्विटी से बिल्कुल अलग है। इसमें इन्वेस्टर को कंपनी की हिस्सेदारी नहीं चाहिए होती, बल्कि वह आपके द्वारा बेचे गए हर प्रोडक्ट या सर्विस की सेल पर एक निश्चित हिस्सा मांगता है। उदाहरण के तौर पर, अगर आपने 50 लाख रुपये की फंडिंग ली और डील हुई कि आप हर बोतल की बिक्री पर 10 रुपये की रॉयल्टी देंगे, तो जब तक इन्वेस्टर का पैसा (अक्सर मुनाफे के साथ) वापस नहीं हो जाता, आपको उसे हर सेल पर पैसे देने होंगे।

स्टार्टअप फंडिंग के इस मॉडल में आप अपनी कंपनी की ओनरशिप अपने पास सुरक्षित रखते हैं, लेकिन आपके पास आने वाला कैश यानी ‘कैश फ्लो’ कम हो जाता है। यह उन बिजनेस के लिए अच्छा है जिनका मार्जिन बहुत ज्यादा है।

रॉयल्टी डील के फायदे

1. ओनरशिप कंट्रोल: आप अपनी कंपनी के 100% मालिक बने रहते हैं। आपको किसी बोर्ड मीटिंग में इन्वेस्टर से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती।
2. एग्जिट आसान: एक बार जब इन्वेस्टर का तय किया हुआ अमाउंट (जैसे निवेश का 2 गुना या 3 गुना) रॉयल्टी के जरिए पूरा हो जाता है, तो इन्वेस्टर का आपकी कंपनी से नाता खत्म हो जाता है।
3. क्विक डिसीजन: रॉयल्टी डील में इन्वेस्टर को कंपनी के रोजमर्रा के कामों में दखल देने का हक नहीं होता।

Equity vs Royalty: एक तुलनात्मक नजरिया

नीचे दी गई टेबल से आप समझ सकते हैं कि दोनों में मुख्य अंतर क्या हैं:

फीचरEquity (इक्विटी)Royalty (रॉयल्टी)
मालिकाना हककम हो जाता है (Dilution)पूरा आपके पास रहता है
पैसा वापसीसिर्फ एग्जिट या आईपीओ परहर सेल के साथ शुरू हो जाती है
रिस्कइन्वेस्टर का ज्यादा होता हैफाउंडर के कैश फ्लो पर ज्यादा रिस्क
इनवॉल्वमेंटइन्वेस्टर सलाहकार की भूमिका मेंसिर्फ पैसे से मतलब

स्टार्टअप फंडिंग के लिए कौन सी डील कब चुनें?

स्टार्टअप फंडिंग जुटाते समय आपको अपने बिजनेस के नेचर को समझना होगा। स्टार्टअप के विभिन्न प्रकारों के आधार पर ही फंडिंग का फैसला लेना चाहिए।

1. अगर आप टेक या हाई-ग्रोथ स्टार्टअप हैं:
अगर आप कोई ऐप, सॉफ्टवेयर या ऐसा बिजनेस बना रहे हैं जिसे स्केल करने के लिए बहुत सारे पैसों की जरूरत है और शुरुआती सालों में मुनाफा नहीं होगा, तो आपके लिए ‘इक्विटी’ ही सही रास्ता है। क्योंकि रॉयल्टी देने के लिए आपके पास रेवेन्यू होना चाहिए, जो शुरुआती टेक स्टार्टअप्स में अक्सर नहीं होता।

2. अगर आप इन्वेंट्री या प्रोडक्ट बेस्ड बिजनेस हैं:
मान लीजिए आप कोई चिप्स का ब्रांड या कोई गैजेट बेच रहे हैं, जहाँ हर यूनिट पर आपका मार्जिन फिक्स है। ऐसे में आप रॉयल्टी डील ले सकते हैं। इससे आपको ओनरशिप नहीं छोड़नी पड़ेगी और आप अपनी सेल्स से ही इन्वेस्टर को पैसा चुका पाएंगे।

क्या हाइब्रिड डील भी संभव है?

जी हां, आजकल शार्क टैंक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर ‘हाइब्रिड डील’ काफी पॉपुलर हो रही है। इसमें इन्वेस्टर थोड़ी इक्विटी लेता है और साथ में तब तक रॉयल्टी मांगता है जब तक उसका निवेश किया हुआ पैसा वापस न आ जाए। यह फाउंडर के लिए थोड़ा महंगा हो सकता है, लेकिन अगर आपको तुरंत फंड की जरूरत है, तो यह एक विकल्प हो सकता है। अधिक जानकारी के लिए आप TimesNews360 के बिजनेस सेक्शन को फॉलो कर सकते हैं।

इक्विटी और रॉयल्टी के बीच चुनाव करते समय ध्यान रखने वाली बातें

जब भी आप स्टार्टअप फंडिंग के लिए पिच करें, तो इन 3 सवालों के जवाब खुद से जरूर पूछें:
1. कैश फ्लो की स्थिति: क्या मेरा बिजनेस हर महीने इतना पैसा कमा रहा है कि मैं इन्वेस्टर को हिस्सा देने के बाद भी ऑपरेशंस चला सकूं? अगर नहीं, तो रॉयल्टी से बचें।
2. लॉन्ग टर्म गोल्स: क्या मैं इस कंपनी को बेचकर निकलना चाहता हूँ या इसे उम्र भर चलाना चाहता हूँ? अगर बेचना लक्ष्य है, तो इक्विटी बेहतर है।
3. इन्वेस्टर की वैल्यू: क्या मुझे सिर्फ पैसा चाहिए या इन्वेस्टर का नाम और नेटवर्क भी? अगर नेटवर्क चाहिए, तो उसे इक्विटी देकर पार्टनर बनाना ज्यादा फायदेमंद है।

निष्कर्ष: विजेता कौन?

अंत में, स्टार्टअप फंडिंग के मामले में कोई एक ‘परफेक्ट’ फॉर्मूला नहीं है। इक्विटी उन लोगों के लिए है जो एक बड़ा साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं और जोखिम बांटने के लिए तैयार हैं। वहीं, रॉयल्टी उन लोगों के लिए है जो अपने बिजनेस का कंट्रोल किसी और को नहीं देना चाहते और जिनके पास अच्छी सेल्स है।

एक प्रोफेशनल फाउंडर के तौर पर, आपको हमेशा अपनी कंपनी की ‘कैप टेबल’ और ‘बर्न रेट’ पर नजर रखनी चाहिए। स्टार्टअप फंडिंग लेना सिर्फ चेक लेना नहीं है, बल्कि यह एक लंबी पार्टनरशिप की शुरुआत है। इसलिए, जल्दबाजी में डील साइन न करें। अपनी जरूरतों का आकलन करें और फिर तय करें कि आपको हिस्सेदारी बेचनी है या मुनाफे का हिस्सा साझा करना है। भारत के बढ़ते स्टार्टअप ईकोसिस्टम में अब हर तरह के इन्वेस्टर्स मौजूद हैं, बस जरूरत है तो सही पिच और सही स्ट्रैटेजी की।

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