Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- स्ट्रॉबेरी उत्पादन के लिए लेटेस्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी की जानकारी।
- कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) में शुरू हुई स्पेशल ट्रेनिंग का पूरा विवरण।
- स्ट्रॉबेरी की खेती में लगने वाली लागत और मुनाफे का गणित।
- मॉडर्न एग्रो-टेक जैसे ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग का महत्व।
- सरकार द्वारा किसानों को दी जा रही सब्सिडी और सपोर्ट।
स्ट्रॉबेरी खेती अब केवल ठंडे इलाकों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि आधुनिक एग्रो-टेक (Agro-Tech) की मदद से इसे अब मैदानी इलाकों में भी सफलतापूर्वक किया जा रहा है। हाल ही में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) में स्ट्रॉबेरी खेती पर एक विशेष प्रशिक्षण (Training) कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। इस ट्रेनिंग का मुख्य उद्देश्य किसानों को पारंपरिक खेती से हटाकर हाई-वैल्यू क्रॉप्स (High-value crops) की ओर मोड़ना है ताकि उनकी इनकम में जबरदस्त इजाफा हो सके। प्रोफेशनल जर्नलिज्म की दुनिया में हम देख रहे हैं कि कैसे टेक्नोलॉजी खेती का चेहरा बदल रही है, और यह ट्रेनिंग उसी दिशा में एक बड़ा कदम है।
स्ट्रॉबेरी खेती और आधुनिक तकनीक का संगम
आज के दौर में जब खेती में रिस्क बढ़ रहा है, तब स्ट्रॉबेरी खेती एक गेम-चेंजर साबित हो रही है। केवीके (KVK) के एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि किसान सही साइंटिफिक मेथड और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करें, तो एक छोटे से खेत से भी लाखों का टर्नओवर जनरेट किया जा सकता है। इस ट्रेनिंग प्रोग्राम में किसानों को स्ट्रॉबेरी की नई वैरायटीज, सॉइल टेस्टिंग (Soil Testing), और क्लाइमेट कंट्रोल के बारे में बारीकी से समझाया जा रहा है।
टेक्नोलॉजी की बात करें तो, इसमें पॉलीहाउस (Polyhouse) और नेट-हाउस का रोल काफी महत्वपूर्ण है। स्ट्रॉबेरी के नाजुक पौधों को तेज धूप और भारी बारिश से बचाने के लिए यह स्ट्रक्चर्स सुरक्षा कवच का काम करते हैं। इसके अलावा, Drip Irrigation सिस्टम के जरिए पानी और फर्टिलाइजर का सटीक इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है, जिससे संसाधनों की बर्बादी कम होती है।
प्रशिक्षण के मुख्य बिंदु: किसानों को क्या सिखाया जा रहा है?
केवीके में चल रहे इस प्रोग्राम में केवल थ्योरी नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल नॉलेज पर भी फोकस किया जा रहा है। स्ट्रॉबेरी खेती को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित तकनीकी पहलुओं पर जोर दिया जा रहा है:
- नर्सरी मैनेजमेंट: स्वस्थ पौधों का चयन और उनकी शुरुआती देखभाल कैसे करें।
- प्लास्टिक मल्चिंग (Plastic Mulching): मिट्टी की नमी को बनाए रखने और खरपतवार (Weeds) को रोकने के लिए मल्चिंग फिल्म का सही उपयोग।
- माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स का उपयोग: पौधों की ग्रोथ के लिए जरूरी विटामिन और मिनरल्स की सही डोज।
- पेस्ट कंट्रोल: जैविक और रासायनिक कीटनाशकों का संतुलित इस्तेमाल ताकि फसल की क्वालिटी बनी रहे।
स्ट्रॉबेरी खेती में टेक्नोलॉजी का रोल (Table)
| तकनीक का नाम | उपयोग और लाभ | लागत का प्रभाव |
|---|---|---|
| ड्रिप इरिगेशन | पानी की 70% बचत और सीधा जड़ों तक पोषण। | शुरुआती खर्च, लेकिन लंबे समय में बचत। |
| प्लास्टिक मल्चिंग | मिट्टी का तापमान कंट्रोल और फल की सफाई। | कम लागत, ज्यादा मुनाफा। |
| पॉलीहाउस | ऑफ-सीजन प्रोडक्शन संभव बनाता है। | हाई इन्वेस्टमेंट, हाई रिटर्न। |
| हाइड्रोपोनिक्स | बिना मिट्टी के खेती, शहर के पास छोटे स्पेस के लिए। | एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, प्रीमियम मार्केट। |
आने वाले समय में स्ट्रॉबेरी खेती के लिए सेंसर-बेस्ड इरिगेशन सिस्टम का भी इस्तेमाल बढ़ेगा। TimesNews360 की रिपोर्ट के अनुसार, कई स्टार्टअप्स अब ऐसे डिवाइसेज बना रहे हैं जो किसान के मोबाइल पर अलर्ट भेजते हैं कि फसल को कब पानी या खाद की जरूरत है। यह डिजिटल क्रांति खेती को एक स्मार्ट बिजनेस में तब्दील कर रही है।
खेती का बजट और प्रॉफिट मार्जिन
किसान अक्सर इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि स्ट्रॉबेरी की खेती में इन्वेस्टमेंट कितना होगा। केवीके के विशेषज्ञों के अनुसार, स्ट्रॉबेरी खेती के लिए शुरुआत में एक एकड़ में लगभग 3 से 5 लाख रुपये का खर्च आ सकता है (इसमें मल्चिंग, पौधे और ड्रिप सिस्टम शामिल है)। हालांकि, अगर फसल अच्छी होती है, तो एक सीजन में 10 से 15 लाख रुपये तक की कमाई आसानी से की जा सकती है। स्ट्रॉबेरी का मार्केट रेट हमेशा प्रीमियम रहता है, खासकर बड़े शहरों और होटल्स में इसकी डिमांड कभी कम नहीं होती।
स्ट्रॉबेरी खेती के लिए सही समय और मिट्टी
भारत के कई हिस्सों में सितंबर से नवंबर के बीच का समय स्ट्रॉबेरी प्लांटेशन के लिए सबसे बेस्ट माना जाता है। स्ट्रॉबेरी खेती के लिए ऐसी मिट्टी की जरूरत होती है जिसका pH लेवल 5.5 से 6.5 के बीच हो। रेतीली दोमट मिट्टी (Sandy Loam Soil) इसके लिए सबसे उपयुक्त है। ट्रेनिंग के दौरान किसानों को बताया गया कि कैसे वे अपने खेत की मिट्टी की जांच सरकारी लैब में करा सकते हैं और रिपोर्ट के आधार पर खाद का मैनेजमेंट कर सकते हैं।
चुनौतियां और उनका समाधान
हर बिजनेस की तरह स्ट्रॉबेरी खेती में भी कुछ रिस्क हैं। जैसे कि यह एक ‘पेरिशेबल’ (जल्द खराब होने वाली) फसल है। इसके लिए कोल्ड स्टोरेज और फास्ट ट्रांसपोर्टेशन की जरूरत होती है। केवीके की ट्रेनिंग में ‘पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट’ पर भी एक सेशन रखा गया है, जिसमें किसानों को सिखाया जा रहा है कि कैसे पैकिंग और ग्रेडिंग के जरिए वे अपने फल की शेल्फ-लाइफ बढ़ा सकते हैं। आधुनिक पैकेजिंग तकनीक से स्ट्रॉबेरी को दूर-दराज की मंडियों तक बिना खराब हुए भेजा जा सकता है।
सरकारी योजनाएं और सब्सिडी का लाभ
भारत सरकार की ‘मिडह’ (MIDH – Mission for Integrated Development of Horticulture) योजना के तहत स्ट्रॉबेरी खेती करने वाले किसानों को भारी सब्सिडी दी जा रही है। पॉलीहाउस बनाने और ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगवाने के लिए 50% से 80% तक की छूट मिल सकती है। केवीके का यह प्रशिक्षण केंद्र किसानों को इन योजनाओं के फॉर्म भरने और बैंक लोन की प्रक्रिया में भी मदद कर रहा है।
निष्कर्ष: स्ट्रॉबेरी खेती का भविष्य
कुल मिलाकर देखा जाए तो स्ट्रॉबेरी खेती न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने का जरिया है, बल्कि यह एग्रीकल्चर सेक्टर में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का एक बेहतरीन उदाहरण भी है। केवीके में दी जा रही यह ट्रेनिंग किसानों को प्रोफेशनल और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा माइलस्टोन साबित होगी। जो किसान पारंपरिक फसलों जैसे गेहूं और धान में कम मुनाफे से परेशान हैं, उनके लिए यह एक शानदार विकल्प है।
डिजिटल इंडिया के इस दौर में, अब किसान व्हाट्सएप और यूट्यूब के जरिए भी नई तकनीकों को सीख रहे हैं, लेकिन केवीके जैसी संस्थाओं द्वारा दी जाने वाली हैंड-ऑन ट्रेनिंग (Hands-on training) का कोई मुकाबला नहीं है। स्ट्रॉबेरी खेती से जुड़कर युवा पीढ़ी भी अब वापस खेती की ओर लौट रही है, जो कि एग्रो-इकोनॉमी के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
अगर आप भी एक किसान हैं या एग्री-बिजनेस में रुचि रखते हैं, तो आज ही अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क करें और स्ट्रॉबेरी खेती की नई तकनीकों को अपनाकर अपनी किस्मत बदलें। याद रखें, सही तकनीक और सही समय पर लिया गया फैसला ही आपको एक सफल एग्रो-प्रीन्योर (Agropreneur) बना सकता है।
