- Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- निर्मला सीतारमण ने बैंकों को ‘मिस-सेलिंग’ के खिलाफ सख्त चेतावनी दी है।
- बैंकों को इंश्योरेंस बेचने के बजाय कोर बैंकिंग (डिपोजिट और लोन) पर फोकस करने की सलाह।
- कस्टमर के एक्सपीरियंस और उनके भरोसे को फिर से बहाल करने पर जोर।
- बैंकिंग सेक्टर में बढ़ती अनैतिक प्रैक्टिस और उसके इकोनॉमी पर असर का विश्लेषण।
बैंकिंग सुधार की दिशा में केंद्र सरकार ने अब एक बहुत बड़ा और कड़ा कदम उठाने के संकेत दिए हैं। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने देश के बैंकिंग सेक्टर को आईना दिखाते हुए साफ़ तौर पर कहा कि बैंकों का असली काम ‘मिस-सेलिंग’ करना नहीं, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखना और उसे लोन के माध्यम से इकोनॉमी में सर्कुलेट करना है। पिछले कुछ सालों में बैंकों ने जिस तरह से इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स को बेचने के लिए ग्राहकों पर दबाव बनाया है, उसने बैंकिंग की साख को कहीं न कहीं ठेस पहुंचाई है।
बैंकिंग सुधार और मिस-सेलिंग का गहरा संकट
बैंकिंग सुधार आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है क्योंकि कई कस्टमर्स की यह शिकायत रहती है कि जब वे बैंक में एफडी (FD) कराने या कोई सामान्य काम से जाते हैं, तो उन्हें जबरन इंश्योरेंस पॉलिसी थमा दी जाती है। वित्त मंत्री ने इस बात को गंभीरता से लेते हुए कहा कि बैंकों को अपने ‘कोर बिजनेस’ पर वापस लौटना होगा। बैंक का प्राथमिक काम है लोगों से डिपॉजिट स्वीकार करना और जरूरतमंदों को लोन देना। लेकिन आजकल बैंक कर्मचारी टारगेट पूरा करने के चक्कर में इंश्योरेंस एजेंट की तरह व्यवहार करने लगे हैं।
यह स्थिति केवल प्राइवेट बैंकों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी बैंकों में भी यह ‘प्रेशर कल्चर’ काफी बढ़ गया है। वित्त मंत्री के इस बयान के बाद अब यह उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में बैंकिंग रेगुलेशन में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। बैंकिंग सुधार के जरिए कस्टमर सर्विस को फिर से प्राथमिकता दी जाएगी।
आखिर क्या होती है ‘मिस-सेलिंग’?
मिस-सेलिंग का मतलब है किसी प्रोडक्ट के बारे में गलत जानकारी देकर या उसके फायदों को बढ़ा-चढ़ाकर उसे ग्राहक को बेचना। बैंकिंग के संदर्भ में, अक्सर देखा जाता है कि बुजुर्गों को ऐसी इंश्योरेंस स्कीम बेच दी जाती है जिनका प्रीमियम वे लंबे समय तक नहीं भर सकते, या फिर उन्हें यह बताया ही नहीं जाता कि यह कोई एफडी नहीं बल्कि मार्केट से जुड़ा हुआ प्लान है।
वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि बैंकों को ‘बैंकएश्योरेंस’ (Bancassurance) के मॉडल पर फिर से विचार करना चाहिए। अगर कोई ग्राहक खुद से बीमा लेना चाहता है तो वह एक अलग बात है, लेकिन उसे मजबूर करना या बैंक की सेवाओं को इंश्योरेंस के साथ लिंक करना पूरी तरह गलत है। बैंकिंग सुधार तभी सफल होगा जब बैंकों में ट्रांसपेरेंसी बढ़ेगी।
डिपॉजिट की कमी और कोर बैंकिंग का महत्व
निर्मला सीतारमण ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान आकर्षित किया—वह है बैंकों में घटता ‘लो-कॉस्ट डिपॉजिट’ (CASA)। आज लोग बैंक में पैसा रखने के बजाय शेयर मार्केट या म्यूचुअल फंड में पैसा लगाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। ऐसे में बैंकों के पास लोन देने के लिए पर्याप्त फंड जुटाना मुश्किल हो रहा है। बैंकिंग सुधार के तहत बैंकों को अपनी डिपॉजिट स्कीम्स को और अधिक आकर्षक बनाना होगा ताकि आम जनता फिर से बैंकों पर भरोसा कर सके।
| फीचर | कोर बैंकिंग बिजनेस | थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट्स (इंश्योरेंस आदि) |
|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | डिपॉजिट लेना और लोन देना | कमीशन कमाना |
| कस्टमर रिस्क | बहुत कम (सुरक्षित) | मार्केट रिस्क और लंबे समय का कमिटमेंट |
| बैंक का फायदा | मार्जिन और ब्याज | सीधा मोटा कमीशन |
| भरोसा (Trust) | उच्च (High) | मिस-सेलिंग के कारण कम |
ऊपर दी गई टेबल से साफ है कि बैंक अपने असली रास्ते से भटक रहे हैं। बैंकिंग सुधार के लिए यह जरूरी है कि बैंक कर्मचारी अपने ग्राहकों के साथ एक लॉन्ग-टर्म रिलेशनशिप बनाएं, न कि सिर्फ एक बार का प्रॉफिट देखें।
RBI और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क की भूमिका
इस पूरे मामले में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की भूमिका भी काफी अहम हो जाती है। RBI ने पहले भी कई बार बैंकों को चेतावनी दी है कि वे ग्राहकों की सहमति के बिना कोई भी सर्विस उन पर न थोपें। वित्त मंत्री की हालिया टिप्पणी के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि RBI अब ‘मिस-सेलिंग’ पर भारी जुर्माना लगाने की तैयारी में है।
बैंकिंग सुधार को लागू करने के लिए बैंकों के अंदरूनी इन्सेंन्टिव स्ट्रक्चर (Incentive Structure) को भी बदलना होगा। वर्तमान में, बैंक मैनेजरों और कर्मचारियों को इंश्योरेंस बेचने पर बड़े बोनस और रिवॉर्ड्स मिलते हैं। जब तक यह सिस्टम नहीं बदलेगा, तब तक जमीनी स्तर पर बदलाव आना मुश्किल है। आप इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए RBI की आधिकारिक वेबसाइट पर जा सकते हैं।
क्या बदल जाएगा बैंकों का काम करने का तरीका?
निर्मला सीतारमण के इस सख्त रुख के बाद बैंकिंग इंडस्ट्री में हलचल मची हुई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब बैंकों को अपने सेल्स डिपार्टमेंट और कोर बैंकिंग ऑपरेशन्स के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचनी होगी। बैंकिंग सुधार के इस दौर में डिजिटल बैंकिंग और कस्टमर ग्रीवेंस रिड्रेसल (शिकायत निवारण) को और अधिक मजबूत किया जाएगा।
देश के हर नागरिक को यह अधिकार है कि उसे सही वित्तीय सलाह मिले। अगर आप किसी बैंक के ग्राहक हैं और आपके साथ ऐसी कोई घटना हुई है, तो आपको उसकी शिकायत तुरंत बैंक के लोकपाल (Ombudsman) से करनी चाहिए। बैंकिंग सुधार की लड़ाई में ग्राहकों की जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है जितनी सरकार की सख्ती।
युवाओं और मिडिल क्लास पर असर
मिडिल क्लास भारतीय आज भी अपनी बचत के लिए बैंकों पर सबसे ज्यादा निर्भर है। जब बैंक उन्हें गलत प्रोडक्ट्स बेचते हैं, तो उनकी सालों की मेहनत की कमाई डूबने का खतरा रहता है। वित्त मंत्री ने कहा कि बैंकों को अपनी ‘एथिकल वैल्यूज’ को नहीं भूलना चाहिए। बैंकिंग सुधार के जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मध्यम वर्ग का पैसा सुरक्षित रहे और उन्हें बैंकिंग सेवाओं के लिए परेशान न होना पड़े।
हमारे TimesNews360 के बिजनेस सेक्शन में हमने अक्सर ऐसी रिपोर्ट्स कवर की हैं जहाँ ग्राहकों ने मिस-सेलिंग की शिकायतें की हैं। सरकार का यह कदम उन लाखों ग्राहकों के लिए एक बड़ी राहत है जो बैंकों के सेल्स टारगेट का शिकार बनते रहे हैं।
निष्कर्ष: बैंकिंग सुधार की राह
अंत में, बैंकिंग सुधार का यह नया अध्याय भारतीय वित्तीय प्रणाली को और अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की दिशा में एक बड़ा माइलस्टोन साबित हो सकता है। निर्मला सीतारमण ने जो ‘रेड फ्लैग’ दिखाया है, वह बैंकों के लिए एक वेक-अप कॉल है। बैंकों को समझना होगा कि उनका अस्तित्व ग्राहकों के भरोसे पर टिका है, न कि इंश्योरेंस कंपनियों से मिलने वाले कमीशन पर।
अगले कुछ महीनों में हम देख सकते हैं कि सरकारी और निजी क्षेत्र के बैंक अपनी मार्केटिंग स्ट्रेटजी में बदलाव लाएंगे। बैंकिंग सुधार के तहत अब बैंकों का ध्यान लोन पोर्टफोलियो को बेहतर करने और डिजिटल ट्रांजेक्शन को सुरक्षित बनाने पर अधिक रहेगा। वित्त मंत्री की यह सख्ती केवल एक चेतावनी नहीं है, बल्कि यह एक नए और बेहतर बैंकिंग सिस्टम की शुरुआत है जहाँ कस्टमर सच में राजा (King) होगा।
बैंकिंग सुधार केवल कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर दिखना चाहिए। ग्राहकों को अब उम्मीद है कि जब वे अगली बार बैंक की दहलीज पर कदम रखेंगे, तो उन्हें किसी इंश्योरेंस पॉलिसी के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, बल्कि उनके वित्तीय लक्ष्यों को समझने की कोशिश की जाएगी।
यह खबर भारत के बैंकिंग इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट बन सकती है, और हमें उम्मीद है कि बैंक अपनी जिम्मेदारी को समझेंगे।
