Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- एक साधारण शुरुआत: ओडिशा के एक छोटे से गांव से देश के सबसे बड़े पद तक का सफर।
- पारिवारिक त्रासदियां: कैसे एक-एक करके उजड़ गया पूरा हंसता-खेलता परिवार।
- अध्यात्म से नई जिंदगी: डिप्रेशन से बाहर निकलने के लिए ब्रह्मकुमारीज और मेडिटेशन का सहारा।
- ऐतिहासिक राजनीतिक सफर: पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनने की पूरी कहानी।
- लाइफ लेसन्स: मुश्किल परिस्थितियों में हार न मानने की सबसे बड़ी सीख।
द्रौपदी मुर्मू आज सिर्फ भारत की राष्ट्रपति का नाम नहीं है, बल्कि यह नाम है उस अटूट हौसले का जिसने नियति के सबसे क्रूर प्रहारों को झेलकर भी हार नहीं मानी। हम अक्सर सफलता की चमक-दमक देखते हैं, लेकिन उस चमक के पीछे के अंधेरे और आंसुओं के समंदर को भूल जाते हैं। भारत की पहली आदिवासी और दूसरी महिला राष्ट्रपति बनने वाली द्रौपदी मुर्मू की लाइफ स्टोरी किसी फिल्मी ड्रामा से भी ज्यादा दर्दनाक और उतनी ही प्रेरणादायक (super inspirational) है।
यदि आप कभी अपने जीवन की कठिनाइयों से थककर हार मानने की सोच रहे हैं, तो यह कहानी आपके अंदर जीने और लड़ने का एक नया जज्बा भर देगी। आइए, TimesNews360 के इस विशेष अंक में करीब से जानते हैं उनके जीवन के उस संघर्ष को जिसने उन्हें आज इस मुकाम पर पहुंचाया है।
द्रौपदी मुर्मू: प्रारंभिक जीवन और कठिन संघर्ष की शुरुआत
20 जून 1958 को ओडिशा के मयूरभंज जिले के एक बेहद पिछड़े गांव उपरबेड़ा में जन्मीं द्रौपदी मुर्मू का बचपन से ही संघर्षों से नाता जुड़ गया था। एक संथाली आदिवासी परिवार में जन्मीं इस बच्ची के पास न तो अच्छे संसाधन थे और न ही आगे बढ़ने के आसान रास्ते। उस दौर में आदिवासी समाज में लड़कियों की शिक्षा को लेकर कोई खास जागरूकता नहीं थी।
उनके पिता बिरंची नारायण तुडू एक किसान थे। घर की माली हालत ऐसी नहीं थी कि पढ़ाई-लिखाई का खर्च आसानी से उठाया जा सके। लेकिन उनके अंदर पढ़ने की ऐसी जिद थी कि उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने भुवनेश्वर के रमादेवी महिला कॉलेज से अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। ग्रेजुएशन करने वाली वे अपने गांव की पहली लड़कियों में से एक थीं।
करियर की शुरुआत: एक क्लर्क से शिक्षिका तक का सफर
पढ़ाई पूरी करने के बाद, अपने परिवार को सपोर्ट करने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी की राह चुनी। ओडिशा सरकार के सिंचाई विभाग में उन्होंने एक जूनियर असिस्टेंट (क्लर्क) के रूप में काम करना शुरू किया। लेकिन उनका मन समाज सेवा और शिक्षा की तरफ ज्यादा था। इसके बाद, उन्होंने मानद शिक्षिका (Honorary Teacher) के रूप में श्री अरबिंदो इंटीग्रेटेड एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर, रायरंगपुर में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। बच्चों से उनका गहरा लगाव था और वे अक्सर उन्हें बिना किसी वेतन के भी पढ़ाने को तैयार रहती थीं।
नियति का सबसे क्रूर खेल: जब एक-एक कर उजड़ गया परिवार
कहते हैं कि सोना भी कुंदन बनने से पहले आग में तपता है। द्रौपदी मुर्मू के जीवन में दुखों का जो पहाड़ टूटा, उसकी कल्पना मात्र से ही किसी का भी कलेजा कांप उठे। उनका वैवाहिक जीवन श्याम चरण मुर्मू के साथ शुरू हुआ था। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। सब कुछ सामान्य चल रहा था, लेकिन फिर साल 2009 आया, जिसके बाद उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।
साल 2009 में उनके 25 वर्षीय बड़े बेटे लक्ष्मण मुर्मू की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। इस सदमे से वह अभी उबर भी नहीं पाई थीं कि साल 2013 में उनके छोटे बेटे सिपुन मुर्मू की भी एक सड़क हादसे में मौत हो गई। एक मां के लिए अपने दो जवान बेटों के शवों को कंधा देना दुनिया का सबसे बड़ा दुख है।
लेकिन दुखों का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसके ठीक एक साल बाद, यानी 2014 में उनके पति श्याम चरण मुर्मू का भी दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। सिर्फ यही नहीं, इस दौरान उन्होंने अपनी मां और भाई को भी खो दिया। एक हंसता-खेलता परिवार अचानक सूना हो गया। इस भारी भावनात्मक नुकसान (emotional breakdown) ने उन्हें अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया था।
अध्यात्म और मेडिटेशन: जब टूटे हौसलों को मिली संजीवनी
जब हर तरफ गहरा अंधेरा छा गया था और जीवन जीने की कोई वजह नहीं बची थी, तब द्रौपदी मुर्मू डिप्रेशन की कगार पर थीं। इस नाजुक मोड़ पर उन्होंने खुद को बिखरने से बचाने के लिए अध्यात्म का रास्ता चुना। वे ‘प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय’ से जुड़ीं।
ब्रह्मकुमारीज के साथ जुड़कर उन्होंने राजयोग मेडिटेशन सीखा। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि ध्यान और साधना ने ही उन्हें उस असहनीय दर्द से उबरने की शक्ति दी। उन्होंने अपने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उन्होंने तय किया कि वे अपना बचा हुआ जीवन समाज के कल्याण और गरीबों की सेवा में समर्पित कर देंगी।
राजनीतिक जीवन और ऐतिहासिक सफलता
दुखों के उस काले दौर से गुजरते हुए भी उन्होंने अपने राजनीतिक और सामाजिक दायित्वों से कभी मुंह नहीं मोड़ा। साल 1997 में वे पहली बार रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद चुनी गईं और यहीं से उनका पॉलिटिकल करियर तेजी से आगे बढ़ा।
- साल 2000 और 2009: वे भाजपा के टिकट पर रायरंगपुर से दो बार विधायक चुनी गईं।
- मंत्री पद: ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार (जब भाजपा-बीजद गठबंधन था) में उन्होंने वाणिज्य, परिवहन और मत्स्य पालन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभाला।
- सर्वश्रेष्ठ विधायक: साल 2007 में उन्हें ओडिशा विधानसभा द्वारा सर्वश्रेष्ठ विधायक के लिए ‘नीलकंठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
झारखंड की पहली महिला राज्यपाल
साल 2015 में द्रौपदी मुर्मू ने एक और इतिहास रचा जब उन्हें झारखंड की पहली महिला राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने अपना 6 साल का कार्यकाल बेहद गरिमा और संवेदनशीलता के साथ पूरा किया। राज्यपाल के रूप में उनकी छवि हमेशा विवादों से दूर और जनता के अनुकूल रही।
Droupadi Murmu: Quick Profile Summary
| Particulars | Details |
|---|---|
| पूरा नाम | द्रौपदी मुर्मू (Droupadi Murmu) |
| जन्म तिथि | 20 जून 1958 |
| जन्म स्थान | उपरबेड़ा, मयूरभंज, ओडिशा |
| राजनीतिक दल | भारतीय जनता पार्टी (पूर्व में) |
| वर्तमान पद | भारत की 15वीं राष्ट्रपति (25 जुलाई 2022 से अब तक) |
| पारिवारिक सदस्य (जीवित) | पुत्री इतिश्री मुर्मू |
2022: देश के सर्वोच्च नागरिक पद पर आसीन होना
साल 2022 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया। एनडीए (NDA) ने जब राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम की घोषणा की, तो यह पूरे देश के लिए एक सुखद आश्चर्य था। 25 जुलाई 2022 को द्रौपदी मुर्मू ने भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली।
वह आजाद भारत में पैदा होने वाली पहली राष्ट्रपति और देश की सबसे युवा राष्ट्रपति हैं। उनका राष्ट्रपति बनना भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती को दर्शाता है, जहां एक सुदूर गांव की गरीब आदिवासी महिला भी देश के सर्वोच्च संवैधानिक शिखर पर पहुंच सकती है। राष्ट्रपति बनने की अधिक आधिकारिक जानकारी के लिए आप भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर विजिट कर सकते हैं।
द्रौपदी मुर्मू की लाइफ से मिलने वाले 5 बड़े लाइफ लेसन्स
उनका जीवन केवल एक राजनीतिक सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह हम सभी के लिए एक पर्सनल डेवलपमेंट गाइड (life guide) की तरह है। उनके जीवन से हम ये महत्वपूर्ण बातें सीख सकते हैं:
- मानसिक दृढ़ता (Resilience): परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आप मानसिक रूप से मजबूत हैं, तो आप किसी भी डिप्रेशन और दुख से बाहर निकल सकते हैं।
- अध्यात्म की शक्ति: ध्यान और योग केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नहीं, बल्कि मानसिक शांति और कठिन समय में खुद को संभालने के लिए भी बेहद जरूरी हैं।
- सादा जीवन, उच्च विचार: देश के सबसे बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी उनकी सादगी और विनम्रता हमें सिखाती है कि जमीन से जुड़े रहना ही आपकी असली ताकत है।
- लक्ष्य के प्रति समर्पण: व्यक्तिगत जीवन में मची उथल-पुथल के बावजूद उन्होंने अपनी जनता और अपने काम के प्रति कभी लापरवाही नहीं बरती।
- शिक्षा ही सबसे बड़ा हथियार है: एक बेहद पिछड़े इलाके से होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा का दामन थामे रखा, जिसने उनके लिए सफलता के द्वार खोले।
निष्कर्ष
द्रौपदी मुर्मू का जीवन हमें सिखाता है कि तकदीर भले ही आपके साथ कितना भी क्रूर खेल क्यों न खेले, लेकिन यदि आपके इरादे फौलादी हैं तो आप अपनी किस्मत खुद लिख सकते हैं। उन्होंने आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया, बल्कि उन्हें सेवा और संकल्प की ऊर्जा में बदल दिया। उनका यह सफर युगों-युगों तक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।
