Highlights: इस आर्टिकल में क्या है?
- प्रणब मुखर्जी का एक साधारण परिवार से देश के सर्वोच्च पद तक का सफर।
- राजनीति के ‘चाणक्य’ और ‘संकटमोचन’ कहे जाने के पीछे की वजह।
- शिक्षा, शुरुआती करियर और इंदिरा गांधी के साथ उनके खास रिश्ते।
- 22 जुलाई 2012: वो ऐतिहासिक दिन जब वो राष्ट्रपति चुने गए।
- भारत रत्न और उनकी विरासत से जुड़ी कुछ अनसुनी बातें।
भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो किसी दल या विचारधारा की सीमाओं में नहीं बंधते। प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) एक ऐसा ही नाम थे। उन्हें लोग प्यार से ‘प्रणब दा’ कहते थे। राजनीति का ऐसा दिग्गज, जिसके पास हर समस्या का हल था और जिसकी याददाश्त का लोहा पूरी दुनिया मानती थी। आज हम बात करेंगे उस शख्सियत की, जिसने भारतीय लोकतंत्र को अपनी बुद्धिमत्ता और शालीनता से नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
प्रणब मुखर्जी: शुरुआती जीवन और शिक्षा (Early Life & Education)
प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मिराती गांव में हुआ था। उनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी एक स्वतंत्रता सेनानी थे और ब्रिटिश शासन के दौरान कई बार जेल भी गए थे। राजनीति और देशभक्ति उन्हें विरासत में मिली थी।
उनकी शिक्षा की बात करें तो उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री हासिल की और फिर कानून (LL.B.) की पढ़ाई पूरी की। क्या आप जानते हैं कि राजनीति में आने से पहले प्रणब मुखर्जी ने एक क्लर्क के रूप में काम किया और फिर विद्यानगर कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर भी रहे? इतना ही नहीं, उन्होंने कुछ समय तक एक पत्रकार के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं।
प्रणब मुखर्जी का प्रोफाइल समरी (Profile Summary)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | प्रणब कुमार मुखर्जी |
| जन्म तिथि | 11 दिसंबर 1935 |
| पद | भारत के 13वें राष्ट्रपति |
| पत्नी का नाम | शुभ्रा मुखर्जी |
| राजनीतिक दल | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस |
| सर्वोच्च सम्मान | भारत रत्न (2019) |
राजनीति के ‘संकटमोचन’ बनने की कहानी
प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक सफर 1969 में शुरू हुआ जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने प्रणब दा को राज्यसभा के लिए चुना। धीरे-धीरे वो इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद सलाहकार बन गए। 1980 के दशक में उन्हें भारत का वित्त मंत्री बनाया गया, और यूरोमनी पत्रिका ने उन्हें दुनिया का सबसे बेहतरीन वित्त मंत्री घोषित किया था।
उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे विरोधी दलों के नेताओं के साथ भी उतने ही सहज थे जितने अपनी पार्टी के साथ। यूपीए सरकार के दौरान जब भी कोई बड़ा राजनीतिक संकट आता था, तो सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की पहली पसंद प्रणब मुखर्जी ही होते थे। उन्होंने रक्षा, विदेश और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों को बखूबी संभाला। उनके बारे में अधिक जानकारी के लिए आप Wikipedia पर देख सकते हैं।
22 जुलाई 2012: जब ‘प्रणब दा’ बने महामहिम
भारत के संसदीय इतिहास में 22 जुलाई 2012 की तारीख सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। इसी दिन प्रणब मुखर्जी को भारत का 13वां राष्ट्रपति चुना गया था। उन्होंने पी.ए. संगमा को भारी मतों से हराया था। रायसीना हिल्स पहुंचने के बाद भी उनका स्वभाव नहीं बदला। वे एक ‘People’s President’ बने रहे। उन्होंने राष्ट्रपति भवन को आम जनता के लिए खोल दिया और ‘माननीय’ (Honourable) जैसे प्रोटोकॉल वाले शब्दों के इस्तेमाल को कम करने की हिदायत दी।
उनकी कुछ खास उपलब्धियां और फैसले
प्रणब मुखर्जी ने अपने कार्यकाल के दौरान कई कड़े फैसले लिए, जिनमें दया याचिकाओं (Mercy Petitions) का निपटारा भी शामिल था। उन्होंने अफजल गुरु और अजमल कसाब जैसे आतंकियों की दया याचिका खारिज करने में कोई देरी नहीं की। उनका मानना था कि कानून सबके लिए बराबर है।
जीवनशैली और कुछ दिलचस्प राज
क्या आपको पता है कि प्रणब मुखर्जी पिछले 50 सालों से हर रोज अपनी डायरी लिखते थे? उन्होंने अपनी वसीयत में कहा था कि उनकी मौत के बाद ही ये डायरी सार्वजनिक की जाए। वे बहुत बड़े खाने के शौकीन भी थे, खासकर बंगाली मछली करी उन्हें बहुत पसंद थी। काम के प्रति उनकी निष्ठा ऐसी थी कि वे दिन में 18-18 घंटे काम करते थे।
आज की भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में जहाँ लोग जल्दी हार मान लेते हैं, वहाँ प्रणब मुखर्जी का जीवन हमें सिखाता है कि धैर्य और निरंतर मेहनत से आप किसी भी मुकाम को हासिल कर सकते हैं। अधिक मोटिवेशनल कहानियों के लिए आप TimesNews360 पर हमारे अन्य लेख पढ़ सकते हैं।
भारत रत्न से नवाजे गए ‘भारत के लाल’
साल 2019 में प्रणब मुखर्जी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। यह उनके दशकों लंबे सार्वजनिक जीवन और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान का सम्मान था। भले ही वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी नीतियां और उनके विचार भारतीय राजनीति के लिए हमेशा एक मार्गदर्शक (Compass) की तरह काम करेंगे।
निष्कर्ष (Final Words)
प्रणब मुखर्जी का जीवन केवल एक राजनीतिज्ञ की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे शिक्षक, पत्रकार और विजनरी लीडर की कहानी है जिसने खुद को देश की सेवा में समर्पित कर दिया। उनकी सादगी, विद्वता और काम के प्रति समर्पण आज के युवाओं के लिए एक प्रेरणा है।
हमें गर्व है कि हमारे देश में प्रणब मुखर्जी जैसी महान विभूतियों ने जन्म लिया और लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत किया।
