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UN Indigenous Forum: New York में जुटे 1000+ आदिवासी नेता, जानिए जल-जंगल-ज़मीन पर क्या हुआ बड़ा फैसला

UN Indigenous Forum की उच्चस्तरीय सालाना बैठक New York स्थित संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय में औपचारिक रूप से शुरू हो चुकी है, जहां दुनिया के सात प्रमुख सामाजिक-भौगोलिक क्षेत्रों के मूल निवासी प्रतिनिधि, राजनयिक और सिविल सोसायटी लीडर्स एक छत के नीचे जुटे हैं। इस महामंथन का मुख्य उद्देश्य सदियों से उपेक्षित रहे स्थानीय समुदायों के पारंपरिक भूमि अधिकारों, सांस्कृतिक संरक्षण और जलवायु संकट से निपटने में उनकी ऐतिहासिक भूमिका को कानूनी मान्यता दिलाना है। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर अमेज़न के जंगलों और आर्कटिक के बर्फीले इलाकों तक के मूल निवासी नेताओं ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर आदिवासियों का विस्थापन अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

⚡ Quick Highlights (1 मिनट में समझें)

  • कहाँ और कौन: संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय (New York) में 90+ देशों के 1,000 से अधिक इंडिजिनस डेलीगेट्स का जमावड़ा।
  • केंद्रीय विषय: ‘स्वशासी अधिकार और पारंपरिक ज्ञान’ को आधुनिक क्लाइमेट पॉलिसी में प्राथमिकता देना।
  • ग्रीन ट्रांजिशन का संकट: इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) बैटरी और सोलर पैनल के लिए जरूरी क्रिटिकल मिनरल्स (लिथियम, कोबाल्ट) की माइनिंग के चलते स्थानीय जनजातियों की जमीनों पर बढ़ता कॉरपोरेट कब्जा।
  • वैश्विक आंकड़े: दुनिया की कुल जैव-विविधता (Biodiversity) का 80% हिस्सा आदिवासियों के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सुरक्षित है, जबकि वैश्विक आबादी में इनकी हिस्सेदारी महज 6% है।

UN Indigenous Forum में उठी 5 सबसे बड़ी मांगें

इस ऐतिहासिक सम्मेलन में प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि अब केवल कागजी प्रस्तावों से बात नहीं बनेगी। UN Indigenous Forum के मंच से नेताओं ने रेखांकित किया कि वैश्विक पूंजीवाद और कथित ‘हरित क्रांति’ की कीमत सबसे कमजोर तबकों को चुकानी पड़ रही है। बैठक में निम्नलिखित मुख्य मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिली:

  1. फ्री, प्रायर एंड इन्फॉर्म्ड कंसेंट (FPIC): किसी भी विकास परियोजना, बांध निर्माण या खनन से पहले स्थानीय ग्राम सभाओं और ट्राइबल काउंसिल की पूर्व और खुली सहमति अनिवार्य की जाए।
  2. क्लाइमेट फाइनेंस का सीधा आवंटन: अरबों डॉलर के वैश्विक क्लाइमेट फंड्स का 1% से भी कम हिस्सा सीधे स्थानीय समुदायों तक पहुंचता है। इसे बढ़ाकर न्यूनतम 20% करने की मांग की गई है।
  3. पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दर्जा: जंगलों की आग बुझाने, औषधीय पौधों के संरक्षण और जल स्रोतों को बचाने के स्वदेशी तरीकों को आधुनिक विज्ञान के समकक्ष नीतिगत मान्यता मिले।
  4. मानवाधिकार रक्षकों की सुरक्षा: पर्यावरण और जमीन की रक्षा करने वाले स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों और हत्याओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी निगरानी प्रणाली बने।
  5. सांस्कृतिक और भाषाई विरासत: लुप्तप्राय होती स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण के लिए यूनेस्को और संबंधित देशों की सरकारों द्वारा विशेष बजट तय किया जाए।

वैश्विक स्तर पर आदिवासी समुदायों की जमीनी स्थिति: एक नजर

नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है कि दुनिया भर में स्थानीय निवासियों की भूमिका पर्यावरण के लिए कितनी अहम है और वे किन गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं:

पैमाना / क्षेत्रवर्तमान स्थिति / आंकड़ेप्रमुख चुनौतियां
वैश्विक जनसंख्यालगभग 47.6 करोड़ (दुनिया की कुल आबादी का ~6%)अत्यधिक गरीबी में रहने वाले लोगों में 19% हिस्सेदारी
जैव-विविधता संरक्षणदुनिया की 80% जैव-विविधता इनके इलाकों मेंडीफॉरेस्टेशन और अनियंत्रित व्यावसायिक खनन
भूमि अधिकारपारंपरिक रूप से 50% भूमि पर निर्भरकेवल 10% भूमि पर ही कानूनी मालिकाना हक प्राप्त
भाषा एवं संस्कृतिदुनिया की 7,000 में से 4,000 भाषाएं आदिवासियों कीहर पखवाड़े एक स्वदेशी भाषा विलुप्त होने की कगार पर

Green Energy का दोहरा चेहरा: ‘Clean’ किसके लिए?

मौजूदा दौर में जब विकसित देश जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) से हटकर रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ रहे हैं, तो इसके लिए जरूरी लिथियम, तांबा और निकेल का अधिकांश भंडार आदिवासी क्षेत्रों के नीचे दबा हुआ है। इस साल UN Indigenous Forum के सत्रों में यह कड़वी सच्चाई सामने आई कि कैसे पर्यावरण को बचाने की आड़ में अर्जेंटीना, चिली, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के जनजातीय समूहों को उनकी पुरखों की जमीन से बेदखल किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के नीति निर्माताओं को यह चेतावनी दी गई है कि यदि ‘ग्रीन कॉलोनियलिज्म’ को बढ़ावा दिया गया, तो यह पर्यावरण सुरक्षा नहीं बल्कि मानवाधिकारों का संगठित हनन होगा। वैश्विक कूटनीति के इस संवेदनशील घटनाक्रम पर और अधिक विस्तृत विश्लेषण के लिए इस Category के बाकी अपडेट्स जरूर पढ़ें।

काम की बात / Ground Reality: भारत और पूर्वोत्तर के संदर्भ में इसका क्या अर्थ है?

भारत के संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढांचा (जैसे PESA Act 1996 और Forest Rights Act 2006) प्रदान करती है। हालांकि, न्यू यॉर्क में आयोजित UN Indigenous Forum के विचार-विमर्श से यह साफ होता है कि वैश्विक स्तर पर नीतियों का क्रियान्वयन अब भी नौकरशाही की ढिलाई और कॉर्पोरेट दबावों से जूझ रहा है। स्थानीय समुदायों को जब तक नीति-निर्माण के शीर्ष स्तर पर बराबर का साझेदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य हासिल करना असंभव होगा। इस संबंध में अधिक आधिकारिक दस्तावेज आप संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक पोर्टल पर जाकर देख सकते हैं।

कुल मिलाकर, UN Indigenous Forum ने इस बार यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आधुनिक दुनिया को आदिवासियों को ‘मदद के मोहताज’ के रूप में देखना बंद करना होगा; वे वास्तव में इस धरती के सबसे कुशल और सक्षम संरक्षक हैं।

Frequently Asked Questions (FAQ)

1. UN Indigenous Forum क्या है और इसका गठन कब हुआ था?

UN Permanent Forum on Indigenous Issues (UNPFII) संयुक्त राष्ट्र की एक सलाहकार संस्था है, जिसकी स्थापना जुलाई 2000 में हुई थी। यह मंच आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरण, स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवाधिकारों से जुड़े स्वदेशी मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) को दिशा-निर्देश और रिपोर्ट सौंपता है।

2. क्या इस फोरम के फैसले सभी देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी (Binding) होते हैं?

नहीं, संयुक्त राष्ट्र के इस मंच की सिफारिशें सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून की तरह बाध्यकारी नहीं होती हैं। हालांकि, UNDRIP (United Nations Declaration on the Rights of Indigenous Peoples) के तहत किए गए संकल्पों का अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, मानवाधिकार अदालतों और ट्रेड एग्रीमेंट्स में गहरा नैतिक व नीतिगत प्रभाव पड़ता है।

3. इस वर्ष की बैठक का सबसे संवेदनशील मुद्दा कौन सा रहा?

इस वर्ष का सबसे तीखा मुद्दा ‘ग्रीन मिनरल्स’ और क्लाइमेट ट्रांजिशन प्रोजेक्ट्स के लिए आदिवासियों की पैतृक भूमि का अधिग्रहण रहा। प्रतिनिधियों ने मांग की है कि बिना स्थानीय जनजातियों की खुली सहमति और वित्तीय हिस्सेदारी के किसी भी खनन परियोजना को मंजूरी न दी जाए।

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